उदास उर्मिला

महल का एक सुनसान गलियारा उसमे एक है कमरा शांत।

मंद मंद दीपक लौ है और उर्मिला के पथरीले नैन।।


वेदना दिल भरा पड़ा है कहने को कुछ नहीं है बोल।

इनके पति ने भी ठाना है जाने वन गमन की ओर ।।


पिता आज्ञा से राम बंधे हैं लक्ष्मण जी तो सहचर मात्र।

सीता ने भी ठाना है वन में जाना पति के साथ।।


हे न्याय मूर्ति फिर न्याय करो तुम क्या उर्मिला को नही अधिकार?

वन गमन की सहचरी बनकर साथ चले फिर आपके साथ??


राह पड़े जो काटें होंगे उसको उर्मिला कर लेगी साफ ।

सीता आप सहित लखन लाल का दासी बनकर देगी साथ।।


उसकी पीड़ा आप समझें तो कम हो जाएगी उसकी संताप।

उसके मन  गहरे आघात पर मरहम तो लग जायेगी आप ।।


वो भी नारी उसके भी अधिकार हैं क्योँ हो रहा अधिकार दमन?

वर्ष चौदह बहुत बड़ा है क्यों झेलना उसे विरह का दंश??


इतिहास कैसे भुल सकती है उर्मिला जैसे नारी का बलिदान।

वलिदान की पराकाष्ठा है परिवार समाज को उर्मिला का वलिदान।।


श्री कमलेश झा

नगरपारा भागलपुर