भारत के माथे की बिंदी



यह सिंधु सभ्यता की हिंदी

ब्रह्मा मुख, वेद पुराणों की
भाषा से निकली है हिंदी।
पूरब से पश्चिम तक फैली
पर्वत से सागर में लहरी
बदले परिधान बहुत है पर
दिल से निकली,लब पर ठहरी।
कबीरा,तुलसी की भाषा है
आँसू में छिपी अभिलाषा है
यह प्रेमचंद्र के भावों में
जन जीवन की एक आशा है।
इतिहास हिंद का रखती है
बदला परिवेश समझती है
कितना आधुनिक हो जग जन
फिर भी हर मन में बसती है।
यह हिंद युवा का मान बनी
लघु शून्य,गुरु सम्मान बनी
रंगरेज बनी अंग्रेजों की
विश्व गुरु हिंदुस्तान बनी
क्यों खोए हो कोलाहल में
जबकि रहते गंगाजल में
करके आतिथ्य अब विदा करो
करो ज्योति प्रखर हिन्दाँचल की।

महिमा तिवारी 
भिंडा नवीन,रामपुर कारखाना,