जब ज़िंदगी दस्तक देती है

पत्थरों को चीरकर बहते हैं झरने,

बिन माली के पल्लवित होते वन घने।

दुर्गम पथ होते आसान,जहाँ विश्वास की आहट होती है।

मिल जाती है मंज़िल ,जब ज़िंदगी दस्तक देती है...


किसने सोचा था अरुणिमा सिन्हा

 माउंट एवरेस्ट फतह कर जायेगी,

बिन पैरों की वह लड़की 

युग की मिशाल बन जायेगी।

गिरना, लड़खड़ाना,चोट खाना,

फिर उठ जाना ज़िंदगी है,

हिम्मत ही पूजा और हिम्मत ही बंदगी है।

है हौसलों की उड़ान तो दरिया भी राह देती है,

मिल जाती है मंज़िल जब ज़िंदगी दस्तक देती है...


निराशा में छुपी आशा को ले जान तू,

उड़ जा गगन में अम्बर से सुधा मांग के ला तू।

अपनी भुजा की शक्ति को पहचान,

हम में ही है लघु वृत,हम में आसमान।

नीरव मन को मलय बयार शब्दों से भर देती है।

मिल जाती है मंज़िल जब ज़िंदगी दस्तक देती है...


                 रीमा सिन्हा (लखनऊ)