ताक धिनक धिन

ताक धिनक धिन 

ताक धिनक धिन

नाचे मन ये मेरा

बीती काली रात विरह की

मंजुल मिलन सवेरा ।

चातक सी मैं प्यासी थी

हृदयांगन में उदासी थी

'पी कहां'-बन पपीहा कूकी

बरसी इक न कपासी थी

स्वाति बन वो गिरा सीप पे

मुक्ता चित्त हुआ मेरा

बीती काली रात विरह की

मंजुल मिलन सवेरा।

पल्लवित हर इक कली

मुकुलित उनपे अलि

श्वासों के विस्तृत पुलिन पर

मदिर गंध उड़ती चली

आलिंगित प्रसून युग्न पर

शांत अंतरंग स्पृहा

बीती काली रात विरह की

मंजुल मिलन सवेरा।

ताक धिनक धिन

ताक धिनक धिन

नाचे मन ये मेरा

बीती काली रात विरह की

मंजुल मिलन सवेरा।


रचना सरन,

न्यू अलीपुर,कोलकाता