जब तक...

शायद अभी भी कुछ जड़ें हैं अपनत्व की

हमारे भीतर ,

पहचान लेते हैं 

कोई भी कोना धरती का

कहीं से भी ,

..लौट आते हैं बार-बार

ऊंचाईयों से भी

इसी अपनत्व की ओर !!

हां, बचा हुआ है अभी थोड़ा सा आकाश

कि अक्सर..

बातें करते हैं चांद-तारों से..

करते हैं प्रतीक्षा सूरज की..

करते हैं प्रार्थनाएं बारिश की..

..रहनें देतें हैं

धरती को "धरती" की ही तरह ,

..सोचनें देतें हैं

आकाश को उसका फैलाव ,

और..

इस तरह..बचाए रखतें हैं

.. थोड़ा सा पानी !!

सुनों, जब तक बची रहेंगीं जगहें

पृथ्वी, आकाश और पानी के लिए ,

..बची रहेगी

ये मनुष्यता भी तब तक !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश, मेरठ