कि जैसे..

बरसों बरस बाद भी

हम-तुम मिलते रहेगें ऐसे ही

कि जैसे

आलिंगन करता है बसंत

एक पीली पत्ती का

लंबे इंतजार के बाद ,


कि जैसे

लौट आती हैं खुशहाल बारिशें

अपने समस्त गीलेपन के साथ

तपते हुए रेगिस्तानों में

अंतरालों बाद ,


कि जैसे

लिखी जाती हैं

कुछ पंक्तियां

उस छूटी हुई कविता की

अधूरी रहने के बाद भी ,


कि जैसे

आखिरकार..पहुंच ही जाते हैं

कुछ बेनाम से ख़त

अपने-अपने "सही पतों" पर

इधर-उधर भटकने के बाद !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश, मेरठ