राज्यों के बीच बढ़े आपसी संवाद

असम और मिजोरम में क्षेत्रीय विवाद तो पुराना है, लेकिन बीते दिनों जो घटनाएं घटी हैं, उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए. यह ध्यान देने की बात है कि दोनों राज्यों में एक ही दलध्गठबंधन की सरकारें होने के बावजूद तनातनी बहुत बढ़ गयी और दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों के बीच सोशल मीडिया पर सार्वजनिक रूप से कठोर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। तब यह प्रश्न उठा था कि दोनों राज्य आपसी बातचीत से तनाव को समाप्त करने का प्रयास क्यों नहीं कर रहे हैं.अंततः केंद्रीय गृह मंत्रालय और गृह मंत्री अमित शाह के हस्तक्षेप के बाद अब संवाद प्रक्रिया शुरू हुई है. ऐसे विवाद राजनीतिक प्रक्रिया से ही सुलझ सकते हैं. पूर्वोत्तर भारत की पृष्ठभूमि जटिल है और उन राज्यों में परस्पर सीमा विवादों के अलावा जातीय विविधता, नागरिकता, भाषा आदि को लेकर प्रश्न हैं.ऐसे में असम और मिजोरम के हिंसक झड़प के घटना को एक सबक के रूप में लेना चाहिए. देश के संघीय ढांचे, केंद्र-राज्य और राज्य-राज्य संबंधों के बारे में यह धारणा रही है कि यदि एक दल या गठबंधन के सरकारें दोनों जगह हों, तो विवाद या तनाव की स्थिति पैदा नहीं होती, लेकिन हालिया मामले में यह बात भी नहीं हुई.देश में जहां कहीं भी राज्यों में विवाद हैं, उनके समाधान के संबंध में हमें दो बिंदुओं से दिखाना चाहिए. एक, केंद्र और राज्यों के बीच क्या संबंध है, और दूसरा, राज्यों के बीच किस तरह का संवाद चल रहा है. जब भी संघीय ढांचे के बात होती है, तो आम तौर पर केंद्र और राज्य के संबंधों को लेकर चर्चा होती है, लेकिन संघीय व्यवस्था के सफलता के लिए यह भी आवश्यक है कि राज्यों में भी आपसी तालमेल हो.हमारे देश के विभिन्न क्षेत्रों- पूर्वोत्तर, मध्य भारत, उत्तर भारत, दक्षिण भारत- के लिए क्षेत्रीय काउंसिल भी गठित किये गये हैं.इस व्यवस्था का उद्देश्य यह है कि इन क्षेत्रों के राज्य नियमित रूप से आपस में बैठक कर समस्याओं के समाधान के कोशिश करें. पुराने विवादों के अलावा अभी हमने महामारी के दौर में भी मेडिकल सामानों की उपलब्धता और आप्रवासी कामगारों के पलायन को लेकर खींचतान देखने को मिली. इन मामलों में भी पड़ोसी राज्यों के बीच तालमेल के आवश्यकता महसूस हुई. यह चिंताजनक है कि केवल पूर्वोत्तर के क्षेत्रीय विकास काउंसिल की बैठक ही बीच-बीच में होती रही है, लेकिन अन्य समूहों की बैठकें न के बराबर होती हैं.विवाद में एक अहम पहलू पहचान का भी है. उदाहरण के लिए, जैसे कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद है, वह केवल पानी का मसला नहीं है. क्षेत्रीय पहचान का तत्व पूर्वोत्तर में भी बहुत महत्वपूर्ण है. इन विवादों को लेकर समझौता करने में क्षेत्रीय गौरव का प्रश्न बहुत प्रभावी हो जाता है. ऐसे में जो राजनीतिक दल होते हैं, वे आम सहमति बनाने या कुछ छोड़ने के लिए तैयार नहीं होते. उन्हें लगता है कि ऐसा करना उनकी हार समझी जायेगी और उनके राज्य में उन्हें राजनीतिक तौर पर नुकसान उठाना पड़ेगा.सो, गतिरोध हमेशा बना रहता है. राज्यों के विवाद का सरल समाधान है- संवाद. जिन राज्यों के बीच विवाद है, वे लगातार आपस में बातचीत करें. इसमें केंद्र सरकार की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. यह भूमिका है संयोजन और समन्वय की. इतिहास में देखें, तो पानी के विवादों में केंद्र सरकार की वैसी सक्रिय भूमिका नहीं रही है. नब्बे के दशक में जब एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री थे, तो उन्होंने कावेरी विवाद के समाधान के लिए हस्तक्षेप किया था. इसकी वजह यह थी कि वे कर्नाटक से थे और वहां से उनके राजनीतिक हित जुड़े हुए थे. इस कारण उनके लिए निष्पक्ष रूप से हस्तक्षेप कर पाना संभव नहीं था.अगर हम हरियाणा और पंजाब के बीच पानी के विवाद के इतिहास को देखें, तो दोनों राज्यों में सत्तर और अस्सी के दशक की राजनीति एक बड़े कारक के रूप में दिखती है. उस दौर में पंजाब में अकाली राजनीति हावी थी, तो हरियाणा में कांग्रेस का वर्चस्व था. प्रारंभ में यह विवाद तो पानी और जमीन का था, पर बाद में उसने खालिस्तान मुद्दे को हवा देने में मुख्य भूमिका निभायी. इस प्रकार हम पाते हैं कि हर विवाद में क्षेत्रीय अस्मिता और राजनीतिक लाभ-हानि बड़ा कारक बनकर सामने आते हैं. नब्बे के दशक के प्रारंभिक वर्षों में अंतरराज्य परिषदों का गठन हुआ था, लेकिन ये काउंसिल राज्यों के बीच राजनीतिक संवाद करने का उद्देश्य अपेक्षित रूप से हासिल नहीं कर सके. शायद ही कभी आपसी विवादों पर किसी काउंसिल में गंभीरता से बातचीत हुई है. इसका एक कारण इन काउंसिल की राजनीतिक संरचना भी है. राज्यों की सरकारें विरोधी दलों की सरकारों के साथ सीधे संवाद नहीं कर पातीं और मसला एक-दूसरे पर आरोप लगाने में उलझा रहता है. इसका एक उदाहरण हमें कोविड महामारी के समय देखने को मिला.

क्षेत्रीय काउंसिल एक अच्छा मंच हमारे पास है, लेकिन यह भी हमें देखना है कि ऐसे राजनीतिक प्रतिष्ठानों को लेकर राजनीतिक दलों में कितना भरोसा है. यदि भरोसा नहीं रहेगा, तो किसी सहमति या समझौते को लेकर राज्यों के भीतर विरोधी दल उसे समर्पण या हार के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं और सरकारों की कोशिश को कमजोर कर सकते हैं. हमने यह समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन, आजीविका, जनसंख्या आदि से संबंधित समस्याओं के बढ़ने के साथ पानी, जमीन, पलायन और अस्मिता के विवाद भी गहरे होते जायेंगे.इन सभी मुद्दों को लेकर व्यापक विचार-विमर्श और जागरूकता की आवश्यकता है. इन मुद्दों पर राजनीतिक स्वार्थ की दृष्टि से नहीं, बल्कि सकारात्मक राजनीतिक दृष्टिकोण के साथ समझदारी बनानी होगी. यह कुछ बरसों में पूरी तरह से नहीं किया जा सकता है. इसके लिए ऐसा माहौल बनाना होगा, जहां लोग सरकारों और राजनीतिक दलों पर उचित दबाव बना सकें. यह काम हमेशा राजनीतिक दल करेंगे, इसकी उम्मीद नहीं की जा सकती है। ऐसे में गैर-सरकारी संगठनों, सिविल सोसाइटी, सामाजिक कार्यकर्ता और मीडिया को बड़ी भूमिका निभानी होगी. लोगों को गंभीर मुद्दों से जोड़ना होगा ताकि विवादों के समाधान का रास्ता निकल सके. हम कानून और अदालत से स्थायी हल हासिल नहीं कर सकते हैं. विवादों के कारण विकास परियोजनाएं बाधित होती हैं. इससे होनेवाले आर्थिक घाटे के बारे में हमें सोचना होगा।