जब लगी प्रीति तो

श्याम से जब लगी प्रीति तो

फिर ज़माने से क्या वास्ता

मिल गया मीत मन का मेरे

फिर किसी से हो क्या राबता

उसके रँग में रँगी रात दिन

मैं तो उसकी दिवानी हुई।

प्रेम में जैसे मीरा कभी

और राधा सी रानी हुई।।

अब तो रंगीन दुनिया मेरी 

साथ झूमें है अंबर धरा।।

मोहता मन मेरा मोहना 

मोर पंखी मुकुट सिर धरे।

चूम यमुना का तट ढूँढती

वो कहाँ रास लीला करे।।

आज मै खिल रही फूल सी 

मन मेरा प्रेम उपवन बना।।

रूप में प्रेम की बात हो

भावना भाव भी साथ हो।

प्रेम की वो गली हो भली

चाह में प्राण तन साथ हो।।

फिर तो जीवन मेरा धन्य हो

मन नयन ध्यान दीपक जला।।


प्रमिला 'किरण'

इटारसी मध्य प्रदेश