अरमानों को दिल में दबाकर नहीं रखता,मुश्ताक़,,,,,,

सेहत याब होने के अभी मेरे 

इमकान ज़िंदा हैं,

कानों में मेरे तुम्हारे सभी 

अल्फ़ाज़  ज़िंदा हैं,

बे ज़मीरों के दिल मुहब्बतों स

े यक़ीनन खाली होंगे,

रिश्ते ख़ून के हुए पानी, मेरा 

मगर किरदार ज़िंदा है,

क़सम है , रूबरू  मेरे बेज़मीरी

लेकर नहीँ आना,

मर  जाऊंगा, मगर बच्चों के 

लिए ताक़ीद ज़िंदा है,

बिछड़ता हु मै तुमसे फिर मिलन

े का वादा  करके,

आंखे वीरान सही दिल में 

मागर तूफ़ान ज़िंदा है,

अरमानों को दिल में  दबाकर 

नहीं रखता,मुश्ताक़,

मेरे लहू से तुम खेलो तुम्हारा 

भाई अभी ज़िंदा है,,,,,,,,


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

सहज़ हरदा मध्यप्रदेश