मेरा गिरधर

नित प्रेम का वह रूप लेकर

'गीता'का जग को ज्ञान देकर, 


अधरों पर उनके मुस्कान सुंदर 

है नित नवीन मेरा गिरधर। 


भक्ति का वह प्रकाश सुंदर

फैला रहा मन उर्वी के ऊपर, 


सहज ही मुस्कान उसकी, 

आज उसकी दृष्टि है मुझपर ।


मैं विकल यूं बावरी सी 

भोर की ज्यों विभावरी सी, 


नीरद से मुझको देख कर 

मुझ में अपनी प्रीति कर,


कुछ अलौकिक बोल रहा है

राज कितने खोल रहा है।


मां शारदे,अब कर अनुग्रह 

उर में प्रीति का है संग्रह,


भरदे मेरे शब्दों में आज

सिर्फ गिरधर का ही नाद,


इस धरती से अंबर तक 

प्रभात से अंतिम रात्रि तक, 


सिर्फ उसका  है प्रकाश 

हो रहा मुझको आभास। 


उदित है दिनमान जिससे

मैं अचंभित आज उससे, 


प्रत्यक्ष प्रभु की सुंदर छवि

दिख रही मुझको अभी, 


वह श्याम वर्ण, परिधान सुंदर

मुख कमल ,बंसी अधरों पर, 


छवि में दमक कितने रवि की

वर्णन में शब्द कम है कवि की,


सुंदर मनोहर गात के संग

खिल रहे प्रभु प्रात के संग, 


अहो !मैं कैसे करूं बखान 

मैं, अकिंचान तृण के समान,


वह विराट कितना महान

सभी कुछ जिसका विधान,

 

उत्कृष्ट सृष्टि का सृष्टि कर्ता

कर अनुग्रह, हे दोष हर्ता,  


पाकर तुझको निहाल हो जाऊं, 

भव मुक्ति कर, सुख मैं पाऊं। 


वाद्ययंत्र में वह मृदंग ध्वनि है, 

पवित्र हुई हिय की अवनी।।


अंजनी द्विवेदी (काव्या)

देवरिया उत्तर प्रदेश