वक्त ना होता एक समान

आज कलम फिर धधक उठी

विषय था इतना खास।।

धधक रहा था अफगानिस्तान

नकेल थी तालिबानियों के पास।।


अटक रही थी सांसें वहां हर देश 

के वरिष्ठों की बस अपनों को बचाने की आस

कोई ना सोचे अफगानिस्तान के वासीयों

का वो उम्मीद लगाऐ मदद की आज।।


मानवता खत्म हो रही लगता यही

उनको अटक रही अब साॅंस।।

इंसान से तो अब कोई उम्मीद नहीं

खुदा तू भी खामोश खड़ा मेरे साथ।।


आंखों के सामने हमारी बच्चियों 

औरतों की लूटी जा रही लाज।।

बता खुदा क्यों विवश कर दिया

तूने खड़ा कर हमें दुश्मनों के पास।।


लिखा हर ग्रंथ मे औरतों मे बसे देवी 

करो सभी इनका सम्मान।।

आज फिर क्यों तेरे होते ओ खुदा

इन औरतों का हो रहा अपमान।।


तालिबानियों को समझाऐ कोई

तो नारी है देवी समान।।

किया अपमान सीता का जिसने

वो रावण भी ध्वस्त हुआ था महान।।


वक्त एक सा ना रहता।।२।।


वीना आडवानी"तन्वी"

नागपुर, महाराष्ट्र