आज़ाद हिंद

एक जुनून था वह और थी उनकी, बस एक ही ज़िद,


चाहे जो कुछ भी हो जाए, आज़ाद करेंगे हम हिंद,


भगाने की अंग्रेजों को थी, उनने अपने मन में ठानी,


देशभक्ति की ख़ातिर, दी उनने कितनी ही कुर्बानी,


एक ध्येय था, एक लक्ष्य था, था एक ही मकसद,


भारत छोड़ो का ही नारा, गूंज रहा था हर घर-घर,


देश के अंदर भी तो, कई बाधाएँ पैर पसार रही थीं,


कुछ राजाओं की यारी, गोरों संग बढ़ती जा रही थी,


सभी अपनी अपनी, कूटनीतिक चाल चल रहे थे,


देश भक्तों के आगे, हथकंडे सभी नाकाम हो रहे थे,


साथ दिया होता सबने गर, छोड़कर लालच अपना,


नहीं टिक पाते गोरे, टूट गया होता उनका सपना,


लालच की ज़ंजीरों नें तो, तब भी कुछ को घेरा था,


इसीलिए देश बना, गोरों के हाथों का खिलौना था,


सदियों तक गुलामी में, जकड़ा रहा था देश हमारा,


अहिंसा से ही लड़ना है, यही तो था संकल्प हमारा,


आज़ादी की गूंज, कान उनके सहन ना कर पाए,


बहाया खून हज़ारों का, वीर फिर भी ना घबराए,


गुलामी की ज़ंजीर काटने में, स्वयं ही क़ैद हो गए,


संकल्प कम ना हुआ, फांसी तक पर लटक गए,


देर से ही सही, अंग्रेजों को यह समझ में आना था,


देश के ज़र्रे-ज़र्रे में, भारत छोड़ो का ही नारा था,


देश प्रेमियों का दमखम, कभी ना रुकने वाला था,


नहीं रुक सकी वह आंधी, तूफ़ान उसे बन जाना था,


जल्लाद अंग्रेजों को, वापस जाने पर मजबूर किया,


हिमालय जैसे अटल रहे, शीश कभी झुकने ना दिया।


 -रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)