दृढ़ निश्चय

हृदय व्यथित है,मन विचलित है,

नित भाव  अनोखे  जाग  रहे हैं।

कुत्सित भाव भंगिमा लेकर हम,

दायित्व  निर्वहन से भाग  रहे हैं।

खण्डित जीवन जीने को परवश,

ऐसी भला  विवशता क्या  है ?

मनवांछित फल पाने की इच्छा में,

इतनी अड़चनऔरअबलता क्या है?

तुम वीर , धीर  मानव  हो प्यारे,

फिर मन में इतनी अधीरता क्यों है?

साहस के संग  बढ़ो कर्मपथ  पर,

किसी और पर  निर्भरता क्यों  है?

सच्ची लगन और चाहत रखकर,

आगे  ही आगे  बढ़ता चल राही।

कठिन  डगर  भी   सुगम  बनेगी ,

बन जा मानवता का सच्चा माही।

छोड़ अंदेशा , मन  स्थिर कर,

दृढ़ निश्चय कर चलता चल।

पछतावा, हो  ऐसे  छण  को,

दूर  झटक  कर  बढ़ता  चल ।

अनुपम चतुर्वेदी, सन्त कबीर नगर, उ०प्र०