ये भी भला कोई रचना है!

बड़बोले देख लेते हैं

अपने महान कवियों की

कविताओं के भीतर घुसकर 

तहखानों में छिपे दर्द को

अपनी दिव्य दृष्टि से

लेकिन

हो जाती है उन्हें रतौंधी

दिन दुपहरिया में ही

जब दर्द के सैलाब में

डूबे हुए हाशिये के समाज पर

हो रहा होता है अत्याचार 

उन्हें यह बिल्कुल नहीं दिखता।

तब बड़बोलों के जुबान को

मार जाता है लकवा

बुद्धि हो जाती है सुन्न और

ज्ञान ऐसे होता है गायब

मानो गधे के सिर से सिंग

उसपर बोलने में होती दिक़्क़त

हो जाते हैं हलकान 

और तो और जब 

किसी ने किया प्रतिरोध इस अन्याय का

व्याभिचार, शोषण व जुल्म का 

भेदभाव और अनाचार का

मनबढुओं के दुराचार का

अपने वास्तविक शब्दों में

तो करते है वे पूरी कोशिश 

खारिज करने की उसे 

कहते हुए यह कि

ये भी भला कोई रचना है!


-- संतोष पटेल 

नई दिल्ली

वरिष्ठ साहित्यकार