अफगानिस्तान के हालात का जिम्मेदार कौन?

आज पूरी दुनिया अफगानिस्तान की तस्वीर देखकर हैरान है। अफगानियों की बेबसी बेचैन करने वाली है, उनके हालात देखकर तरस आ रहा है, लोगों के मन में बस यही प्रश्न है कि तालिबान आखिर इतनी आसानी से अफगानिस्तान पर कब्जा करने में कैसे सफल हो गया? अफगानिस्तान में लोगों के जानवरों से भी बदतर इन हालातों के लिए लोग अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन व अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति अशरफ गनी को दोषी मान रहे हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे इतिहास में अमेरिका की सबसे बड़ी हार कह रहे हैं व बाइडेन से इस्तीफा मांग रहे हैं। ब्रिटिश रक्षा मंत्री बेन वालेस ने भी कहा है कि अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाने का फैसला अमेरिका की एक गलती है। अमेरिकी सैनिकों की वापसी के लिए पहले 11 सितंबर की तारीख तय थी फिर 31 अगस्त तय कर दी गई, लेकिन तालिबानियों ने 15 अगस्त को ही काबुल पर कब्जा कर लिया।

        अमेरिका से सेना वापस बुलाने की बात सबसे पहले डोनाल्ड ट्रंप ने की थी, उन्होंने इसके लिए 1 मई 2021 की तारीख तय की थी, जिसे बढ़ाकर जो बाइडेन ने 31 अगस्त 2021 कर दी। इससे पहले अमेरिका और तालिबान के बीच दोहा में एक समझौता हुआ था, जिसे दोहा समझौता कहा जाता है, इसके अनुसार तालिबान अपने इलाके में अलकायदा और आतंकवाद को बढ़ावा नहीं देगा। राष्ट्रीय स्तर पर शांति से बात होगी लेकिन तालिबान ने हमले शुरू कर दिए और फिर अमेरिकी सैनिक वापसी की तैयारी करने लगे। सवाल यह है कि क्या अमेरिकी सैनिकों के अफगानिस्तान छोड़ने का मतलब, अफ़गानिस्तान तालिबान को सौंपना था? जाहिर है अमेरिका ऐसा नहीं कर सकता। 8 अगस्त को जो बाइडेन से पूछा गया था कि क्या तालिबान अफगानिस्तान पर जल्द ही कब्जा कर लेगा तब बाइडेन ने कहा था ऐसा नहीं होगा।

       हालांकि अमेरिकी एजेंसी बाइडेन सरकार को बता रही थी कि तालिबान कैसे आगे बढ़ रहा है, लेकिन कहा जा रहा है कि बाइडेन सरकार ने इस पर न कोई ध्यान दिया और ना ही कोई एक्शन लिया और नतीजा आज दुनिया के सामने है। अमेरिका, ब्रिटेन और नाटो के सहयोगी देशों ने पिछले 20 सालों में काफी समय अफगान सुरक्षाबलों को ट्रेनिंग देने में खर्च किया, लेकिन दावा किया जा रहा है कि यह सब हुआ जरूर, लेकिन सैनिकों को लेकर शुरू से ही अफगानिस्तान में बहुत बड़ी गड़बड़ी चल रही थी। अमेरिका जिस तरह से मौन है, उससे जाहिर है कि बाइडेन यह ठान चुके थे कि अफगानिस्तान की आग में अमेरिका अब अपने हाथ और नहीं जलाएगा। इसीलिए लोग बाइडेन को अफगानिस्तान के इस हाल के लिए दोषी करार दे रहे हैं, लेकिन एक सच यह भी है कि अफगानिस्तान की सरकार भी इसके लिए बराबर की कसूरवार है। अफगानिस्तान की सरकार अब तक अमेरिका के सहारे फल-फूल रही थी। चिंता मुक्त, चुनौती मुक्त, तरक्की और ताकत जुटाने की जिम्मेदारी से मुक्त यह सरकार बिल्कुल सुस्त और दिशाहीन थी, यही वजह थी कि सरकार के नुमाइंदे करप्शन के अथाह समुद्र में डूबते गए। नेता और बड़े अफसर देश के सिस्टम को खोखला करते रहे, ये खोखली सरकार और सिस्टम सिर्फ 75 हजार आतंकियों के आगे धराशायी हो गए। लोगों के मन में सवाल है कि अफगानिस्तान के सैनिक आखिर क्या कर रहे थे? वायुसेना होने के बावजूद जमीन पर मुट्ठी भर लोग कैसे जीतते रहे और आगे बढ़ते रहे? सच तो यह है कि तालिबान मजबूत नहीं, बल्कि अशरफ गनी बहुत कमजोर थे।

      तालिबान एक आतंकी ग्रुप है। कट्टर सोच, लड़ने-मरने का जज्बा और आंख बंद कर अपने अफसरों की बात मान लेना तालिबानी लड़ाकों की खासियत है। दूसरी ओर अशरफ गनी का न अपने गवर्नर्स पर कंट्रोल था और ना ही नेताओं पर। ना अशरफ गनी ने अपनी सेना और पुलिस को मजबूत करने पर कभी ध्यान दिया। तालिबान ने अपने मिशन की शुरुआत छोटे प्रांतों से की, तालिबानियों ने अफगानिस्तानी नेताओं को मिलाया, सैनिकों के परिवार वालों और परिचितों से संपर्क किया। तालिबान के ब्रेनवाश से नेता व सैनिक सरेंडर करते रहे। हर देश की तरह अफगानिस्तान भी अपनी सुरक्षा के लिए एक मोटा फंड रिलीज करता था लेकिन करप्शन के चलते सेना के जवानों को घटिया खाना व घटिया हथियार मिल रहे थे, उन्हें जरूरी सुविधाएं नहीं मिल पा रही थीं। सेना के लिए जो हथियार और गोला-बारूद खरीदे गए, उनकी भी कालाबाजारी होती थी, यही वजह है कि तालिबानियों के हाथों में इतने आधुनिक हथियार नजर आते हैं। अफगानिस्तान के अफसर व नेता हथियार बेचकर दौलत बटोर रहे थे तो वहीं तालिबान का हथियार डिपो दिन-रात बढ़ता जा रहा था। अमेरिका के रहते तालिबान खामोश जरूर था लेकिन सक्रिय भी था।

        तालिबान पहले पश्तूनों का ग्रुप माना जाता था, बाद में यह उत्तरी इलाके में भी फैल गया। तालिबानी गांव-गांव में अपने समर्थक बनाते रहे। तालिबान फैलता रहा और अमेरिकी एजेंसियां सोती रहीं। इससे पता चलता है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसियां या तो नाकाम रहीं या वो इतनी बेफिक्र थीं कि तालिबान के फैलने की रिपोर्ट ही न दे सकीं। अशरफ गनी की हालत से उनकी सेना के अफसर और सैनिक अच्छी तरह परिचित थे, इसीलिए हर महीने करीब 5000 सैनिक नौकरी छोड़ रहे थे। यह स्थिति किसी भी देश के लिए बेहद खतरनाक होती है, लेकिन अशरफ गनी और उनके सहयोगियों ने इसे रोकने या नई भर्ती पर कोई ध्यान नहीं दिया। तालिबान ने चंद दिनों में साबित कर दिया था कि उसकी जीत तय है, लेकिन लोगों को सेना और वायु सेना पर भरोसा था, अशरफ गनी को अमेरिका पर भरोसा था, लेकिन जिन्हें फ्रंट पर जाकर लोगों की जान बचानी थी, सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया। अफगानिस्तान के सैनिकों को पता था कि उनकी जान की परवाह सरकार को रत्ती भर भी नहीं है।

       अफसर, नेताओं और रणनीतिकारों के मुंह में काली कमाई का खून लग चुका था। जिसे सिर्फ अपने फायदे की सोचने की लत लग जाए, वो इन अफगानियों के बारे में क्या सोचता? यही वजह है कि आज अफगानिस्तान के लोग सताए जा रहे हैं, रो रहे हैं, सड़कों पर बेमौत मारे जा रहे हैं और प्लेन से गिरकर जान गंवा रहे हैं, उनका अपना ही मुल्क जहन्नुम बन गया है।


रंजना मिश्रा ©️®️

कानपुर, उत्तर प्रदेश