नौनिहाल

सपने देखने वाली आंखें

मोबाइल देखने में व्यस्त हैं।

दिमाग हो रहा है सुस्त

जीवन भी अस्त व्यस्त है।

कहां चूक गए हैं मां बाप

यह भूल तो जबरदस्त है।

कहां से आज़ाद भगतसिंह आयेंगे ?

कोई नही अब वतन परस्त है।

बस खुलापन चाहिए इस पीढ़ी को

अपने में होकर गुम ये हो रहे मस्त हैं।

ना सपने हैं, ना उम्मीदें हैं

दिन रात डोलते मदमस्त हैं।

उठाओ, जगाओ, इन्हे बताओ

अंधेरे में खोने का, नहीं यह वक्त है।

अर्चना त्यागी जोधपुर राजस्थान।