मैं

सुनो ना जेहन में एक, 

यूं ही खयाल आया 

मेरे मन मंदिर में 

तुम सिर्फ तुम ही हो 

मेरे माथे का सिंदूर,

मेरे मस्तक पर दिव्य बिंदिया 

नथ भी तो सुहाग का प्रतीक है,

मेरे  अधरों  की लाली भी 

झुमके, गले का हार 

कराते तुम्हारे होने का एहसास 

मुझे यह आशीर्वाद मिलता है 

सदा सुहागन रहो 

उसमे भी तुम्हारी सलामती,

सचमुच बाँछे खिल जाती है 

सिंदूर पर नाज  करती हूं

और जब माँग भरती हूं 

एक गरिमामय सा महसूस होता है 

यह सब तुम ही तो हो, 

जो रहते हो हमेशा मेरे साथ 

मेरी बाजूबंद में, मेरी खनकती हुई चूड़ियों में 

कई बार इन अंगूठी में आंचल फंस जाता है 

वहां भी तुम्हारी उपस्तिथि प्रतीत होती है 

करघनी में पाजेब में बिछिया, महावर में 

जैसे कर्ण को कवच और कुंडल मिला 

यह सब आभूषण और अलंकार 

मेरे कवच और कुंडल हीं है 

जिससे मैं हमेशा लिपटी रहती हूं 

सर से पांव तक सिर्फ सुसज्जित 

तुम्हारे होने का एहसास लिए 

मेरे मन में तो हमेशा से तुम ही हो 

मेरा पुकार नाम हुआ करता था 

अब मुझे श्रीमती ...के नाम से जाना जाता है  

मेरी नाम में भी तुम्हारी उपस्थिति

कितना बदलाव किया है हमने 

खुशी-खुशी स्वीकार भी 

सिर से लेकर पांव के नख तक 

सिर्फ तुम ही तुम हो 

तुमने कभी दबाव नहीं डाला 

मेरे परिधान पे जैसी भी रहूं 

किन्तु सवाल खुद से है 

एक बार केश धोया 

बालकनी में सूखा रही थी 

फिर खुद आइने में देखा 

एक अपराध बोध हुआ तुरंत मांग भरी 

ऐसा क्यों होता है ये सवाल,

पर तुममें तो मैं कहीं नहीं दिखती

ऐसा कुछ तो हो, जो तुममे मुझे दर्शाये 

ऐसा क्यों नहीं हुआ, क्या जाने 

मन है कैसे  सवाल करता है. 

तुम्हें कोई आशीर्वाद देता है

की हमेशा पत्नीवती  रहो 

ऐसा क्यों इसका उत्तर 

मुझे कभी नहीं मिल पाता 

कभी-कभी लगता है 

मैं सिर्फ मैं रहूं 

किंतु नाज है मुझे अपनी सिंदूर पर 

माथे की बिंदी पर नथ पर 

झुमके पर हार पर कंगन पर 

बाजूबंद पर पाजेब पर बिछिया 

मन में बसे तुम पर 

श्रीमती...तुम्हारे नाम से जाने पर 

चलो कोई बात नहीं "तुम" सिर्फ तुम रहो 

और मैं सिर्फ तुमसे ही जानी जाऊं 

सच है लड़कियां सिर्फ और सिर्फ "मैं" 

अपने पिता के पास ही होती हैं 

उनकी प्यारी बिटिया 

काश................... 


✍✍✍✍✍

सविता सिंह मीरा 

झारखण्ड 

जमशेदपुर