मेरे रोम-रोम में बहना

मन मन्दिर में तुम्हें बसाया,

प्रेम में सारा जीवन पाया।

तुमसेअब कुछ नहीं चाहिए,

तुमसे ही संसार बसाया।

तुमसे ही मैं दुनिया देखती,

तुममें ही मैं खुद को ढूंढती।

कितनी खुशकिस्मत हूं मैं,

हर पल मैं परछाई बनती।

जब तुम मेरा हाथ पकड़ कर,

अपने अंक में भरते हो।

सच कहती हूं स्वर्ग सरीखा,

मुझमें रंगत भरते हो।

क्या है स्वर्ग,नर्क क्या है?

मुझे नहीं कुछ इससे लेना।

बस तुम मेरी श्वासों में घुलकर,

मेरे रोम-रोम में बहना।


अनुपम चतुर्वेदी, सन्त कबीर नगर, 

उ०प्र०