जन्माष्टमी

नटखट कान्हा कर अटखेली

कभी राधा कभी गोपियन को सताऐ

छेड़ तान मीठी बांसुरी की

खिंच सबको ले आऐ।।


गौ हो या गोपियन को वो

नटखट मंत्रमुग्ध कर जाऐ

चुरा खाऐ हर बार माखन सबका

फिर भी चहेता सबका कहलाऐ।।


फोड़े मटकी पनघट पे सबकी

कभी कालिया को धूल चटाऐ

ओ मेरे कान्हा तुम काहे को

दर्शन अब तक मुझको ना देने आऐ।।


तड़पत अंखियां तेरे दरस को

अब तो दरस दे तू  कान्हा

तेरी भक्ति की दिलोजान से

अब तक तू क्यों ना माना।।


माखन मिसरी भोग बनाई

अपने हाथन से तुझे खिलाऊं

ना देख तुझे कान्हा मैं व्याकुल

जोर-जोर से बुलाई।।


तड़पत मेरे मन की व्यथा कान्हा

अखियन से बह कर आई।

अब तो आजा मेरे कान्हा जी

वीना मीरा बन  यशगान तेरी गाई।।


वीना आडवानी तन्वी

नागपुर, महाराष्ट्र