एक-दूसरे के पूरक..

वह

पकड़ से दूर

सुदूर नीले आसमान में

तैरता रहता है

सफ़ेद बादल की तरह ,

उसे नहीं अच्छा लगता

बरसना

बारिश बनकर ,

भादों की धूप में

वो चाहता है ठहरना

छांव बनकर

धरा के लिए ,

जबकि मैं

देखना चाहती हूं उसमें

एक बेपरवाह सी बारिश 

ताकि हरे-भरे रहें

सभी शहर और गांव ,

सभ्यताएं मनाती रहें ऐसे ही

सभी तीज-त्योहार

बन-संवर कर !!

हां , कुछ ऐसे ही देखा करते हैं हम

अपनी इस मित्रता को

एक-दूसरे के पूरक बनकर !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश , मेरठ