राशन कार्ड

गफूर की मृत्यु के बाद अमीना अकेली थी।उसका और परिवार दूसरे गांव में रहता था।वह एक बहुत छोटे गांव में रह रही थी।वह झोपड़ी में रहती थी।न कोई खेती थी।न कोई बाग।गुजारा बड़ी मुश्किल से हो रहा था।वह अकेली थी।साठ वर्ष की हो चली थी।

कभी खेतों में थोड़ा बहुत काम कर लेती तो कुछ पेट भर लेती थी।उसके पास पुराना राशन कार्ड था।वह भी सरकार की योजना के दौरान रद्द हो गया।लोगों के दूसरे कार्ड बन गए।अमीना का भी फॉर्म भरा गया था और उसने  रुपए भी दिए थे।पर उसका राशन कार्ड नहीं बना। उसने दोबारा भी रुपए दिए फिर भी राशन कार्ड नहीं बना।

एक दिन गांव में लेखपाल का आना हुआ।अमीना को यह बात पता चली। वह लेखपाल के पास गई।अमीना ने जाकर कहा, "साहब मुझे पता चला कि आपने मेरा नाम लिस्ट से काट दिया था। मुझसे खुंश है इसलिए। मेरी झोपड़ी पर कब्जा हो रहा था। मैंने अपनी शिकायत उच्च अधिकारी से कर दी। आप मेरा साथ नहीं दे रहे थे।आपने ऐसा क्यों किया।मैं इतनी गरीब हूं।मैं बहुत परेशान हूं। मुझ पर तरस खाते तो लक्षम की बात न मानती।"

लेखपाल, "मैं क्यों काटता नाम।मुझे क्या?और तूने हिम्मत क्यों की।मेरी शिकायत करने की।अब भुगत। खा तो रही है खेत में काम करके। सरकार भी मेरा कुछ न बिगाड़ सके। नेता जी का हाथ मेरे सिर पर है।"

लगभग दस दिन बाद अमीना खेत से गुजर रही थी। खेत के पास एक लड़का मिला।उसने अमीना से बातें की। अमीना ने परेशानी बताई। लड़के ने अपना नाम मक्खन बताया।

मक्खन, "अम्मा चिंता मत करो। मैं राशन कार्ड बनबाने की कोशिश करूँगा।

चार दिन बाद मक्खन ने अमीना के राशन कार्ड का आवेदन अपने पैसे से करा दिया।अब लेखपाल के हस्ताक्षर होने थे। मक्खन लेखपाल के पास गया। बहुत निवेदन किया पर वह कहाँ पसीजे।

लेखपाल," सब फ्री में करवाना चाहते हो। मैं भी तो ऊपर खर्च करता हूँ। पैसा बहुत ऊपर तक जाता है। लाओ दो सौ रुपया। रूपये ईमानदारी के हैँ क्योंकि हस्ताक्षर जो करूँगा। "

मक्खन,"साहब जरा दया करो। अम्मा बहुत गरीब है। दुआ मिलेगी।"

लेखपाल, "सब काम दुआ से हो जायेगा। पांच लाख में मेरी नौकरी लगी। कहाँ से निकालूं पैसा। समझते नहीं। परेशान करते हैँ। पैसा खर्च न होये।"

अब मक्खन की जेब में एक सौ पचास रूपये थे। वह लेखपाल को दे दिए। और दो दिन बाद अपने किसी परिचित से तहसील में भेज दिया।

कुछ दिन गुजरे और इस तरह चार माह गुजर गए।

पर अमीना का राशन कार्ड अभी तक नहीं बना था।वह लड़का अक्सर चेक कराता पर राशन कार्ड ऑनलाइन नहीं दिखता था।अभी कुछ नहीं।अभी कुछ नहीं। बस यही था।

अमीना ने डीलर से बात की तो उसने कहा, "कहाँ मर गयी जाकर।₹1000 मुझे देती तो अगले दिन ही राशन कार्ड बन जाता।

अमीना मन ही मन सोच रही थी," हे खुदा मैंने तो ₹1000 कभी एक साथ अपने आप से नहीं गिने।  भले ही मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं।अपना नाम ही लिखना जानती हूं। रुपए तो मैं गिन सकती हूं। पर मुझे कभी ऐसा मौका नहीं मिला कि ₹1000 एक बार में गिर सकूं।इतनी बड़ी रकम की बात कह दी।राशन कार्ड गरीबों के लिए अलग से बनाए गए हैं। "🌿

न जाने कितने लोगों से अमीना ने खुशामद की।पर कोई हल नहीं निकला।अब वह एक दिन प्रधान के पास गई।

अमीना,"प्रधान जी तुम तो जानते हो। मैं अकेली हूं।खर्चा बड़ी मुश्किल से हो रहा है।खेत में काम कर लूं और खा लूं।बस इतना ही है।राशन कार्ड अगर मेरा पास करा दो तो अच्छा हो।अब तक बहाना था अकेले व्यक्ति का नहीं बन सकता। मैंने यह बात कई लोगों से जानकारी ली तो पता चला कि हां बन सकता है।"

प्रधान, "दिमांग खराब करन आ जात है।गफूर काहा मर गयो है।जान आफत में कर दई।कभी कोई फरमाइश,कभी कोई फरमाइश लैके चली आत है।

कुछ काम फ्री में ना होत है।दाम भी लागे।

दमड़ी काहा अपनी जेब से देऊं।"

अमीना रोने लगी और वहां से वापस आ गई। शाम को न खाना खाया न पानी पिया। और सो गई।

तीन दिन बाद खेत पर जाते समय मक्खन फिर मिला। उसके खेत और घर आस -पास ही थे।मक्खन, "अम्मा आप चिंता न करो। मैं तहसील जाऊंगा।फिर प्रयास करता हूं।"

मक्खन तहसील गया। उसने तहसीलदार से अमीना के राशन कार्ड की बात की।

तहसीलदार ने कहा दस दिन बाद बन जाएगा।अब दस दिन भी गुजर गए।राशन कार्ड नहीं बना। फिर मक्खन अमीना को लेकर तहसील दिवस पर  तहसील गया। अमीना ने सारी  समस्या उपजिलाधिकारी को सुनाई। उपजिलाधिकारी ने सम्बंधित कर्मचारी को बुलबाया और राशन कार्ड बनने का आदेश दिया।

सम्बंधित कर्मचारी ने बहाने बनाकर अमीना से दस दिन को कह दिया।

भाग- दौड़ और चिंता में अमीना बीमार पड़ गयी।उठ नहीं पा रही थी। तीन -चार दिन बाद

एक पड़ोसी को दया आयी। अम्मा को डॉक्टर द्वारा झोपड़ी में दिखवा दिया।

डॉक्टर, "कई दिनों से खाना ठीक से नहीं खाने की बजह से आंतें सिकुड़ रही हैँ। यह मेरा अनुभव है। मैं दवा दे दुंगा। रोज लेनी होगी।

कुछ दिन मूंग की दाल ही लेनी होगी।"

पड़ोसी,"क्या करें। हम भिजवा दिया करेंगे। "

डॉक्टर और पड़ोसी चले गए।

अम्मा काफ़ी परेशान थी।

इधर अब दस दिन बीत गए। मक्खन ने कंप्यूटर सेंटर पर राशन कार्ड में नाम चेक कराया। औरख़ुश होकर वह अम्मा की झोपड़ी की तरफ दौड़ा।

जैसे ही अम्मा के पास पहुंचा।  कुछ और ही देखा।

मक्खन,"अम्मा राशन कार्ड बन गया। यह क्या हालत हो गई। "

अमीना, "राशन कार्ड हो गया।चील का मूत्र हो गया।कितना भ्रष्टाचार है।राशन कार्ड के चक्कर में मेरी आंतें मरने लगीं। बेटा तुम्हारा भला हो। पैसा खर्च किया। और इतनी भाग दौड़ की।

ऊपर वाले का शुक्रिया है।जीते जी राशन कार्ड बन ही गया।वरना मैं जब खुदा के पास चली जाती तो इस राशन कार्ड का क्या होता।  राशन कार्ड का प्रयोग क्या ये सारे नेता ही करते।"

मक्खन खुश था। राशन कार्ड बन गया। पर अम्मा की हालत पर बहुत दुखी था । सोचता हुआ वह चल दिया, "

कैसी दुनिया है उफ़ राशन कार्ड।"

दुखी मन से वह अपने घर लौट गया।

पूनम पाठक बदायूँ