दूसरे वर्ष भी बरामद नहीं हुआ दरिया वाली मस्जिद से अलम फातहे फरात


वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा भारत

लखनऊ। पहली मोहर्रम से 10 मोहर्रम तक पूरी दुनिया के मुसलमान अपने अपने तरीके से मुहर्रम मना कर सोग मनाते हैं। जबकि शिया समुदाय पहली मुहर्रम से लेकर 8 रबिऊल अव्वल यानी 2 महीने 8 दिन तक सोग मनाते हैं। एक से दस तक की सभी तिथियों में अलग अलग तरह से मज्लिसों का आयोजन होता है। जिस में 8 मुहर्रम की तारीख बहुत ही महत्वपूर्ण तारीख है। यह तारीख इमाम हुसैन के भाई हजरत अब्बास से मंसूब है। जिन्के बहुत से लक्ब अलम्दार, सक्काए सकीना,बाबुल हवायेज,बाबुल मुराद तमन्नाये मुश्किल कुशा फर्जनदे फातिमा जहरा आदि के लकब से भी जाना जाता है। बताते चलें कि मुहर्रम की 8 तारीख को यहां लखनऊ में स्थित दरिया वाली मस्जिद के नाम से मशहूर मस्जिद से अलम फातेह फुरात के नाम से उठता है। जो बड़े इमाम बाड़े से होता हुआ, रूमी गेट होकर सब्जी मण्डी होता हुआ गुफ्रामाब जाकर एख्त्तिमाम यानी समापन होता है। लाखो की तादाद में लोग अपने मौला को पुर्सा देने आते है। मगर आज 8 मुहर्रम का जो नजारा देखने में आया वो निहायत ही अफसोसनाक ही नहीं शर्मनाक भी रहा कोरोना वायरस की आड़ में सरकार कोई भी मुहर्रम के कार्यक्रम नहीं होने दे रही। जबकि दैनिक कोई कार्य ऐसा नही जो ना हो रहा हो। जिस से मुस्लिम समुदाय ही नहीं अन्य धर्मों के लोगों में भी रोष नजर आ रहा है। हजरत इमाम हुसैन को कर्बला के मैदान में यजीद की फौज ने बडी कुरुर्ता के साथ 72 साथियों सहित शहीद कर दिया था। जिनकी याद में  पूरी दुनिया के शिया समुदाय ही नहीं सभी धर्मों के लोग बड़ी संख्या विशेष तौर से भारत देश में हिंदू भी बहुत   बड़े स्तर पर मोहर्रम का सोग  मनाते है। और उनको याद करके  बिलक बिलक के रोते है। उत्तर प्रदेश की राजधानी  लखनऊ अजादारी का बड़ा मरकज है। 8 मोहर्रम को दरिया वाली मस्जिद से उठने वाला कदीमी(पुराना) जुलूस, नहीं उठा इस जुलूस में आगे आगे मशाले लेकर चलते हैं। इस जुलूस में एकत्रित मुस्लिम समाज के अलावा अन्य समाज के लोग भी इस में बढ़-चढ़कर शिरकत करते हैं। यह जुलूस मौलाना कल्बे जवाद साहब की सरपरस्ती में निकाला जाता है। जो  दरिया वाली मस्जिद से उठ कर। इमामबाडा गुफरामाब पर संपन्न होता है। लेकिन इस साल भी कोरोना की आड़ लेकर सभी जुलूस पर सरकार द्वारा रोक लगाई गई है। जिसको लेकर शिया समुदाय में काफी नाराजगी देखने को मिल रही है। समाजिक कार्यकरती ,वरिष्ठ पत्रकार रजिया साबरी ने कहा कि जिस तरीके बसों, हवाई जहाज में सफर से लेकर दिन चर्या का कोई कार्य नहीं रुका है। सभी साप्ताहिक बाजार भी लग रहे हैं मगर सरकार को सिर्फ मुहर्रम के जुलूस से कोरोना फैलता नजर आ रहा है। इस से सिर्फ सरकार की मंशा और नियत का पता चलता है। कि सरकार सिर्फ एक समुदाय को टार्गेट कर हिंदू मुस्लिम का संदेश देकर नफरत फैलाने की नाकाम कोशिश कर रही है। श्रीमती रजिया साबरी ने कहा जिस तरह से सारे कार्य हो रहे हैं। उसी तरह सरकार हमको जुलूस की भी इजाजत दे भले ही दस व्यक्तियों के साथ एक एक ताजिया ले जाने की अनुमति दे,सोशल डिस्टेंसिंग के साथ इस जुलूस को भी निकाला जा सकता है। यह कोई त्यौहार नहीं बल्कि यह गम का जुलूस है। इस मर्तबा भी लोगों ने अपने अपने घरों में ही ताजिये रख कर मना रहे हैं। मुहर्रम और कर रहे अजादारी, इमाम बार्गाहों,कर्बलाओं में पसरा रहा सन्नाटा लोग सरकार की गाइडलाइन का पालन कर,कर रहे अजादारी।