जाने क्यो

चलते चलते थक चुकी थी मैं,

हूं जिंदा पर मर चुकी थी मैं l

कहीं किसी का आसरा तलाशती,

जाने क्यूँ खुद से जुदा हो रही थी मैं।

विश्वास शायद खुद पर कर लेती,

पर ना जाने क्यूँ आँखे मूंदे चल रही थी मैं।

मंजिलें भी मिल ही जाती,

पर चलने से ज्यादा थम रही थी मैं।

हो अंधेरी रात या दिन का उजाला,

खुद के साये से भी डर रही थी मैं।

वक़्त बदला हर शख्स बदला,

जाने क्यूँ खुद को न बदल पा रही थी मैं।

अब करूँ भी तो क्या करूँ,

थी जिंदा पर जिंदगी तलाश रही थी मैं।


डॉ0 सोनी जी,वरिष्ठ कवयित्री व 

शिक्षिका स्वतंत्र लेखिका व स्तंभकार

मुजफ्फरपुर-बिहार