पुस्तक समीक्षा

"खाँटी ही भली "मंजुला जी का पहला काव्य संग्रह है जिसमें उनकी 68 कवितायें शामिल हैं,जिसे बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।मंजुला जी मूलतः उत्तराखंड से हैं पर अब उदयपुर ही उनकी कर्मभूमि और उनका स्थाई निवास है।मंजुला जी एक ऐसी कवयित्री हैं जो आभासी दुनिया में अपनी अविस्मरणीय कविताओं के लिए जानी जाती हैं  जिनमे गहन भाव,चिंतन और दर्शन को एक साथ महसूस किया जा सकता है। इनकी कवितायें चर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित भी होती रहती हैं।बकौल मंजुला बिष्ट "बरसों बाद...एक दिन आठ वर्षीय बेटू की अधभरी कापियों को देख भीतर कुछ कौंध सी हुई,कविता-किरदार लौटने लगे!लेकिन अलमारी में ही छिपे रहे,जब तलक कि फेसबुक पर हिन्दी-साहित्य के दर्शन न हुए।वरिष्ठ और समकालीन  रचनाकारों का फेसबुक पर मिलना मेरी छिपी रचनाओं को उनके हिस्से की धूप दिखाने का साहस दे गया।जो कमोबेश पृथ्वी के अंधेरे गर्भ में दबे एक बीज के शालीन विद्रोह की भाँति ही था "

मंजुला बिष्ट जी को मैं फेसबुक पर एक लम्बे अरसे से पढ़ रहा हूँ और मैने यह महसूस किया है कि उनकी कविताओं में नोस्टेल्जिया के साथ साथ एक सरल और सहज प्रयोजनवादी भाषिक संरचना भी  देखने को मिलती है जो पाठक को कुछ देर के लिए चिंतन और मनन करने का अवसर दे देती हैं।इसमें कोई दो राय नहीं कि कविता भाषा का सबसे अधिक प्रभावी रूप है जो भाषा के मूर्त और अमूर्त दोनों तरह के प्रभावों को अपने में समाहित किये रहती है और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि आज हिन्दी में अच्छी और सार्थक कवितायें  लिखी जा रही है और उसी कड़ी  में मंजुला बिष्ट जी की कविताओं को भी रखा जा सकता है।इस संग्रह की पहली कविता है "गंतव्य" जिसमें कवयित्री द्वारा  ईश्वर से कुछ अलग अलग अपेक्षाओं का जिक्र उनके गंतव्य के साथ किया गया है।इस पहली कविता को ही मंजुला जी के उस भाषिक संवाद की एक बानगी के तौर पर देखा जा सकता है जिसके लिए वे जानी जाती हैं।

जिजीविषा के लोकगीत 

जीवन का लिहाज,मृत्यु का सम्मान 

सब तक पहुँचे 

दुख की गोपनीयता 

मृत्यु शैय्या की प्रतिक्षायें 

लावारिस की वैधता 

तुम तक पहुँचे 

पिता की कुल जमा दो तस्वीरें

साथी के अलिखित प्रेमगीत

बेटू का प्रथम पग संगीत 

मुझ तक पहुँचे

लेकिन 

हे प्रभु 

तुम्हारे अस्तित्व के प्रति शंका और आशंका 

तुम तलक भी कभी न पहुँचे

इस संग्रह की एक कविता "हिन्दी सीझ रही है "

पुरानी हिन्दी और नई हिन्दी को लेकर चलने वाले द्वंद्व ,साथ ही हिन्दी  की दशा और दिशा पर बार बार उठाये जाने वाले सवाल का बड़ा ही सटीक जबाब देती हुई नज़र आती है जो कवयित्री की भाषाई प्रतिबद्धता का एहसास कराती है।

देखना 

हिन्दी की आत्मा 

अपनी खूँटी से रंभाती गईया की तरह 

अपना नाम हर बोली में पहचान ही लेगी

कहते हैं कविता का एक दायित्व यह भी होता है कि वह उस शक्ति के  विरुद्ध खड़ी हो जाये जो अनुचित हो,स्थापित चेतना के नियमों की अवहेलना करता हो या मानवीय संवेदना को आघात पहुंचाता हो।बेशक़ मंजुला जी की कविता इस धर्म को बखूबी निभाती नज़र आती हैं जब वे मॉब लिंचिंग जैसे विषय पर कुछ कहने की कोशिश करती हैं ।

मॉब लिंचिंग में मरते हुए लोग 

अल्लाते रहे---मिमियाते रहे 

कूटते पीटते अपने स्वयंभू न्यायाधीशों के आगे 

घिसते रहे अपना टूटा उखड़ा अंगूठा 

मिटाने को अपनी बेरहम पूर्व नियोजित मृत्यु प्रक्रिया ।

मंजुला जी की कविताओं में मुझे एक और बात मुझे अच्छी लगती है कि कई बार वे ऐसे विषयों को लेती हैं जो होते तो बहुत सामान्य हैं पर उनकी प्रस्तुति इतनी प्रभावोत्पादक होती है कि पाठक को उसे भूल पाना मुश्किल होता है,बानगी के तौर पर इन पंक्तियों को देखा जा सकता है।

होश संभालते ही 

धरा के हर हिस्से के बावत 

मुझे यही ताक़ीद किया गया है कि 

हर सूरज डूबने का अर्थ,घर लौट आना है 

उसके बाद किसी पर पुरुष का भरोसा ही नहीं है।

कविता भाषा का सबसे अधिक प्रभावी रुप है और कविता की भाषा व्यक्तिगत संवाद की सम्भावनाओं को विस्तृत कर उसे सामाजिक संवाद में बदल देती है तभी तो हम यह कहते हैं कि वह किसी एक को भी सम्बोधित हो कर हर किसी को सम्बोधित होती है।मंजुला जी की यह कविता इस कसौटी पर बिलकुल खरी उतरती है।

स्त्री ने जब अपनी भाषा चुनी 

तब कुछ आपत्तियाँ दर्ज हुईं 

पहली आपत्ति दहलीज को थी 

अब उसे एक नियत समय के बाद भी जागना था 

दूसरी आपत्ति मुख्य द्वार को भी थी 

इसे अब गाहे बगाहे खटकाये जाने पर लोक लाज का भय था।

वैसे तो प्रेम एक ऐसा बिम्ब हैं जिस पर शायद ही कोई ऐसा रचनाकार होगा जिसने लिखा नहीं होगा परंतु यहाँ भी प्रेम को देखने और समझने का मंजुला जी का नजरिया बिलकुल अलग लगता है।

प्रेम ही है 

जो हर सदी में यथार्थ को सन्त्रास बनने से रोक सकता है 

लेकिन फिर भी 

हम अब तक

प्रेम में इतने नाकाबिल क्यों होते जा रहे हैं 

अक्सर ऐसा कहा जाता है कि हर सच्ची कविता एक प्रतिध्वनि होती है,हमारे अनुभवों,हमारे भावों,हमारी स्मृतियों और हमारी कल्पनाओं की मिश्रित प्रतिध्वनि जिसे व्यक्त करने के पीछे हर रचनाकार की मंशा अलग अलग होती है।मंजुला जी के लिए लिखना एक असाध्य कार्य के पूरे होने जैसा है।

दरअसल 

लिखने से ज्यादा कुछ हासिल नहीं होता 

बस खुद से मिलने के कुछ बहाने ज्यादा मिलने लगते हैं 

जो इस दौड़ती भागती कमबख्त जिन्दगी में 

एक असाध्य कार्य के संपन्न होने जैसा है।

कवयित्री ने अपनी कविताओं का सौंदर्यशास्त्र खुद रचा है जहाँ "बाँस में पुष्प का खिलना","सिकुड़ा अंगूठा ",और "होना और पाया जाना"जैसी कविताओं में पाठक को कवयित्री के दर्शन बोध का हर बार एहसास हो जाता है।बानगी के तौर पर इन पंक्तियों को देखा जा सकता है।

क्योंकि श्मशान 

मसान वैराग्य का मौन वाचक है 

इसीलिये हार्दिक अभिलाषी है 

कि बाकी बचे हुए जीवित प्राणी 

श्मशान में एकतरफा मिलन से पहले 

खुद और उस एकमात्र व्यक्ति से मुलाक़ात कर लें ।

हमारी जिंदगी में कुछ ऐसे तल्ख अनुभव होते हैं जो नहीं चाहते हुए भी हमारी काव्य संवेदना के केंद्र में आ  जाते हैं और उनका ज़खीरा इतना बड़ा होता है कि हमारे सृजन में उन्हें ,आसानी से महसूस किया जा सकता है।मंजुला जी ने बहुत छोटी उम्र में अपने पिता को खो दिया था और उन्होनें अपनी माँ को परिवार के मुखिया की भूमिका का निर्वाह करते हुए देखा था,जाहिर है यह सबकुछ उनकी जिन्दगी की स्मृतियों में कैद है और इस स्मृति को उन्होनें बड़ी ही संजीदगी से अपनी दो रचनाओं में उतार दिया है जिसे इस संग्रह की बेहतरीन रचनाओं में शामिल किया जा सकता है।

1)

पिता 

मैं जब भी तुम्हे समीप से देखती हूँ 

लगता है जैसे वर्षों से गुंफित मजबूत कोई फूल 

पंखुड़ियों को स्वत: खोलने लगा हो 

हाँ पिता 

तुम अब वयोवृद्ध नहीँ 

मेरे जीवन में अमरत्व पाते जा रहे हो

2)

भाग्य में पिता का न होना 

दर असल 

माँ का भी कम होते जाना है 

3)

जन्म के पन्द्रह माह 

बाद मिले पितृ शोक को 

कुछ इस तरह जाना समझा है मैने 

मेरे मेरुदंड में 

जितना भी आदिम शोक वृद्धिरत है 

अवरुद्ध कंठ में 

मौनालाप के जितने भी सैंकड़ो अभ्यास हैं 

वे सब पिता की 

क्षणिक स्मृतियों की सुदीर्घ भरपाई हैं 

विस्मृतियों को बचा लेने की पवित्र गोपनीयता है 

 कविता में भाषा और शब्द एक जीवित सत्ता की तरह होते हैं,जब हम किसी की आप बीती सुनते हैं तो हमारी चेतना के तार झंकृत होते हैं और मंजुला जी की यह कविता कुछ ऐसी ही अनुभूति का एहसास कराती है,ऐसा लगता है मानो एक एक शब्द हमारी चेतना को स्पंदित कर रहे हैं।

मंजुला जी एक सन्जीदा कवयित्री हैं जिनके लिये कविता लिखना उनके आत्मा का शुद्ध स्नान है जो उन्हें जीवन समिधा के सम्मुख किसी।  सद्यःस्नात शिशु की तरह मुद्रित करता है,तरोताजा करता है।   

 मंजुला जी का यह काव्य संग्रह भले ही उनका पहला संग्रह हो परंतु यह हरेक दृष्टिकोण से एक मुकम्मल काव्य संग्रह है जिसकी भाषा,शिल्प,शब्द संयोजन सब कुछ इतना सधा और कसा हुआ है कि एक बार पढ़ना शुरू करने के बाद रुकने का मन नहीं होता और यही इसकी सफलता समझी जा सकती है।इस संग्रह में इनकी अनेक ऐसी कवितायें भी जो इनकी रचनाशीलता के प्रति आश्वस्त करती हैं।थोड़े में कहा जाये तो इस रचनात्मकता को सहेज कर रखे जाने के ज़रूरत है।


राजेश कुमार सिन्हा 

बान्द्रा(वैस्ट),मुंबई -50