कंगन

कमला बक्से से कंगन निकाल कर देख रही थी। मां की निशानी थी। ब्याह के समय मां ने चुपके से उसे दिया था, "कहकर की  बेटी कमला, ये तेरे लिए कब से रखी हूँ, ये सोच कर कि तुझे विवाह के समय दूंगी! यह ले संभाल कर रखना.... ये कंगन तेरी मां की निशानी।" 

आज उसी कंगन को देख कमला की आंखों में आंसू आ गए। 

शर्मा जी एक कलर्क थे। एक पुराना घर था। गनीमत था कि, घर अपना था।पर बहुत ही जर्जर हो चुका था। काफी पुराना घर था। बरसात में तो और भी परेशानी होती थी। 

दो ही कमरे थे...और घर के सामने खाली जगह थी। जहां कमला ने  पौधे उगाए थे।  

कमला का बेटा आज पढ़ लिख कर अच्छी सरकारी नौकरी कर रहा था। बैंक में,  दो-तीन साल ही हुए थे नौकरी लगी थी । 

आज वो अपनी पसंद की लड़की से शादी करना चाह रहा था। शादी तय हो चुकी थी । कमला वो कंगन शर्मा जी को देते हुए कहने लगी, "यह लो और जल्दी ही काम शुरू करवा दो...इसे बेचकर.....कम से कम बहु बेटे के लिए एक नया कमरा तैयार हो जाए.....

और हां छत की ढलाई अच्छे तरीके से करवाना.....

बारिश में पानी टपकता है, कमरे में,  रसोई में,...

रसोई में तो बहुत ज्यादा ही टपकता है....मैं तो काम कर लेती हूं.....मेरी तो आदत हो गई है....पर बहू नहीं कर पाएगी,....मैंने तो समझौता किया है....पर जरूरी नहीं की आगे भी ऐसा ही हो....

और हां जो पौधे मैंने लगाए हैं उन्हें गमले में लगा देना, ताकि मेरे पौधे भी सुरक्षित रहे।"

 कमला कहकर आंसू पोंछने लगी! शर्मा जी ने कहा, "अरे पगली, इससे भी अच्छे कंगन बनवा दूंगा !अब तो आकाश बेटा भी कमाने लगा है!" कमला ने कहा, "ये आंसू कंगन के नहीं!!

तुम नहीं समझोगे! आखिर ये टपके का डर ही है!" 


स्वरचित -अनामिका मिश्रा

झारखंड ,(जमशेदपुर)