दास्तानें हवा

कभी दौलत की हवा को तो कभी 

शोहरत की हवा को बदनामी की हवा

नें ढंक दिया। तो कभी बदनामी की हवा 

को इसी दौलत और शौहरत की हवा नें 

ढंक दिया। खेल तो यह बहुत पुराना है। 

इस खेल को कितनों नें खेला और कितनों 

के लिये खेला। अब खेला तो हो ही गया है। 


बदनामी की हवा भी क्या चीज़ है।

जिसको लग गई उसकी जल्दी उतरती

ही नहीं। फिल्मी दुनिया तो बदनामी की

हवा उतरने ही नहीं देती। बदनामी की

हवा में ही दौलत और शोहरत ढूंढती है।


बदनामी की हवा भी बहुत खूब है। हमेशा

से ही नेताओं और फिल्म वालों के इर्द - गिर्द

घूमती है। दौलत शौहरत की हवा भी बदनामी

की हवा के आसपास ही घूमती है तब अक्सर

बदनामी की हवा भी इन्हीं के दरमियां घूमती है। 


हर बार दौलत और शोहरत की हवा

बदनामियां ही नहीं लाती हैं। कभी-कभी

नाम, सुख- शांति और खुशियां भी साथ

लातीं हैं। समुद्र से चलने वाली हवायें नमक

का पैगाम साथ लातीं हैं। वहीं नदी की हवा 

शांति का पैगाम साथ लाती हैं।और बागों की

हवा अपने साथ बहारें साथ लेकर आतीं हैं।


और अब चलते-चलते बदनामियों की हवा 

को सरेराह बदनाम ना किजिये।बदनाम हुए 

तो क्या नाम ना हुआ।इस दिशा में तनिक सा 

भी ना सोचिये।भूलकर भी ना सोचिये। और

जो इस दिशा में चल रहा है उसकी संगत और

रंगत ना लिजिये। 


रमा निगम वरिष्ठ साहित्यकार 

ramamedia15@gmail.com