काठ की गाठ

क्यों शब्दों की आवाज बंधी

 सरगम सारी सूनी सी हुई,

 चाहा लिखना मनहरण बहुत

 मन तूली मेरी सुख हर के भरी।

 मनमीत की मीत से प्रीत घनी

 मधुमास किलोल करे हरदम,

 क्यों कजरी की फिर राग बंधी

 बरसे बरखा बरसात में भी।

 जग भीग रहा,कण-कण है हरा

 नभ प्रीत की अपनी कहानी कहे,

 महिमा मन-मंथन में मथती

 क्यों नयन अयन तरसे ही रहे?

 किस राग में डूबे गीत लिखूँ

 जो प्रीत में अपनी रस भर दें,

 संदेश मेरा पहुंचे तुम तक

 हिय काठ की गांँठ सरस कर दें।


 महिमा तिवारी

 प्रा.वि-पोखर भिंडा नवीन

 रामपुर कारखाना देवरिया-उ0प्र0