फ़ीनिक्स सी जीवंत हो पाऊं

मोक्ष और मुक्ति तो लिखा है नियति में,

तो फिर क्यों न जीने का अरमां रखूं,

पुनर्जन्म की आस को मन में नित जगाऊं,

अग्नि परीक्षा जो सदियों से चली आ रही,

क्यों न मैं भी उनका हिस्सा बन जाऊं,

नारी का जन्म और सहनशीलता पाकर,

सृजनकर्ता का आभार कर पाऊं,

मां के रोपे संस्कारों का अभिमान रख पाऊं,

कर्तव्यों को निभाने का जज्बा जीवंत रख पाऊं,

अधिकारों, दायित्वों की पोटली संभाल पाऊं,

बिखरते रिश्तों को संवारने का,

कुछ अधूरे सपनों को फिर से उड़ाने का,

आहुति कर प्रसव पीड़ा का असहनीय दर्द,

हौसले से अपना संसार रख पाऊं,

अधूरी अभिलाषाएं जो,

समर्पण और बलिदान में पीछे छूट गयी,

पर राख़ होते मन के इक कोने में,

उम्र की दहलीज़ पर,

अब भी पुनर्जीवित होती है,

फ़ीनिक्स की भांति

उड़ने को तैयार है,

कभी सीता, कभी काली बन,

कभी अहिल्या, कभी द्रौपदी बन,

कभी सशक्त गाथा बन।


अंशिता त्रिपाठी

लंदन