आज का अफगान बदहाल

आज जो अफगानिस्तान के हालात हैं 15 अगस्त 1947 का दिन याद दिला दिया। जब 15 अगस्त 1947 को आधी रात को भारत और पाकिस्तान कानूनी तौर पर दो स्वतंत्र राष्ट्र बने थे। पाकिस्तान  की सत्ता परिवर्तन रस्में 14 अगस्त को कराची में कराई गई थी‌ इस विभाजन में करोड़ों लोग प्रभावित हुए थे। कुछ मारे गए एवं कुछ ने अपना घर -बार छोड़कर बहुमत सम्प्रदाय वाले देशों में शरण ली। इसी तरह एक *गदर* फिल्म का सीन आंखों के आगे घूम जाता है।

अफगानिस्तान के हवाई अड्डे पर भगदड़ मची हुई है। अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद हज़ारों  अफगान सोमवार  को काबुल के अन्तर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे पहुंचे और इसी अफरातफरी में कुछ लोग उड़ान भर रहे अमेरिकी सैन्य परिवहन विमान से गिर गए जिससे 7 लोगों की मृत्यु हो गई। तालिबान के कब्जे ने काबुल के हवाई अड्डे पर अफरातफरी मचा दी है। 

रविवार को राष्ट्रपति अशरफ गनी के चार कार और नगदी से भरा हैलीकॉप्टर लेकर देश से बाहर निकल कर और ताजिकिस्तान में शरण लेते ही तालिबान के लड़ाको ने  बर्बरता पूर्वक काबुल में घुसपैठ की। 

लेकिन देश को ऐसे हालात में छोड़ कर भाग जाना क्या सही है??

 तालिबान ने देश के बड़े हिस्से लगभग 25 प्रांतो एवं राष्ट्रपति भवन पर अपना कब्ज़ा कर लिया है, लोग दहशत में हैं, अपने घरों में दुबके हुए हैं, प्रमुख चौराहो पर तालिबान ने अपने लड़ाकों को तैनात कर रखा है। कंधार, हेरात और लश्कार गाह जैसे शहरों में हफ्तों से भारी लड़ाई चलने के बाद हज़ारों लोग घायल हुए, हज़ारों के घर बर्बाद हुए, अफगानी नागरिक छुप-छुपा कर पैदल ही  सीमा को पार करके देश के बाहर जाने की कोशिश कर रहे हैं, बच्चे और महिलाएं डर के साए में जी रहे हैं, ऐसी युवा पीढ़ी जो बीस सालों से यहां पली-बढ़ी तालिबान के खौफ़ में है। तालिबान के शासन में महिलाओं पर होने वाली ज्यादतियां, उन पर कोड़े बरसाना महिलाएं भूली नहीं हैं जो अंतराष्ट्रीय मदद की ओर एक आस लगाए हैं, उनका कहना है कि अगर अफगानिस्तान की स्थिति पर दुनिया ध्यान नहीं देगी तो तालिबान की सत्ता आ जाएगी, अर्थात आंतकवाद को बढ़ावा। काबुल का मंजर ऐसा है कि देख कर दिल दहल जाता है।  

भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना है कि वो बारीकी से जांच कर रहे हैं  अफगान भागीदारों के साथ खड़े हैं। वाशिंगटन द्वारा फौज को वापिस बुलाना ही काबुल की तबाही का कारण माना जा रहा है। अफगानिस्तान युद्ध में असली खलनायक खलीलजाद को माना जाता है। कहा जाता है कि खलीलजाद ने ये सब पाकिस्तान के इशारे पर किया। जब से खलीलजाद को अमेरिका द्वारा अफगानिस्तान का विषेश राजदूत बनाया गया, तब से ऐसी तस्वीरें सामने आई है कि खलीलजाद तालिबानी नेताओं के साथ गले मिलते दिखाई दिए। बहुत से अफगान सैनिक भी हुकुमत की वफादारी से पाला बदल कर तालिबान की शरण में  गए और अपने हथियार सरेंडर कर दिए, तालिबान ने वर्ष के शुरूआत से ही हथियारों से भरे हैलिकॉप्टर भी ज़ब्त किए।  पाकिस्तान के वजीरेआजम इमरान खान अफगानिस्तान पर तालिबान के द्वारा कब्जे का समर्थन करते दिखे। अफगानिस्तान की खराब स्थिति पर नज़र रखते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने विषेश आपातकालीन नम्बर जारी किए। 

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाली और अफगानिस्तान में चुनाव आयोग की पूर्व सदस्या  ज़ारमीना काकर ने बी बी सी को बताया," इन दिनों अगर कोई मुझसे पूछता है कि कैसे हो तो मैं कहती हूं ठीक हूं, मगर उनके इस सवाल पर मेरी ऑंखो में आंसू आ जाते हैं, क्योंकि हम ऐसे दुःखी पंछियों की तरह हो गए हैं जिनकी आंखों के सामने धुंध छाई है, और उनके घरोंदे उजाड़ दिए गए, जो केवल देख सकते हैं, चीख सकते हैं, मगर कुछ कर नहीं सकते, पिछले 20 सालो से हम महिलाओं ने लोकतंत्र की बहाली के लिए बहुत कोशिशें की, लेकिन आज तालिबान की वापिसी से सब कुछ बर्बाद हो गया‌, अफगान की महिलाएं पल-पल मौत को देख रही हैं, नाउम्मीद हो चुकी हैं। आज 60-70 के दशक की तस्वीरों से आज की महिलाओं की स्थिति की तुलना की जा रही है। महिलाओं को सेक्स-गुलाम बनाना और उन पर अत्याचार करना , बुर्का पहनना, लड़कियों का पढ़ाई पर प्रतिबंध । आज तालिबान फिर से वही दोहरा रहा है।

क्या कोई मसीहा आएगा अफगान की रक्षा के लिए ?? या फिर से वही 60-70 के दशक की बर्बता वाला दृश्य देखना पड़ेगा अफगान को??

प्रेम बजाज