निमंत्रण

“मेरी छुट्टी मंजूर हो गई उषा जी! आपकी हुई कि नहीं? काफी दिनों से मायके नहीं जा पाई थी, निमंत्रण मिलते ही आवेदन किया था। देखिए झटपट स्वीकृत हो गई”, रंजना उत्साहित थी।

प्रत्युत्तर न मिलने से प्रश्न दुहराया। उषा जी के नयनों के कोर से जाने क्यों कुछ नमी सी झलक आई, “जी! मैं रक्षाबंधन में नहीं जा रही हूँ। अधिकतर शिक्षिकाएँ छुट्टी पर जा रही हैं, कुछ लोगों का यहाँ होना भी जरूरी है।”

“उषा जी! आपने भी खूब कही! सिर्फ चार घंटे का रास्ता है आपके मायके का। एक दिन की छुट्टी लेने से काम चल जाता। यूँ तो हम मायके जाते ही रहते हैं, पर रक्षाबंधन में बात ही कुछ और होती है। माँ -भाभी के हाथों के पकवान, भाई का प्यार और उपहार, रिश्तेदारों की आवा-जाही। वाह भाई वाह! रौनक होती है। भाभी का मायका उसी शहर में है, मुझसे मिलकर वह मायके चली जाती हैं।

मैं ही बड़बड़ाये जा रही हूँ, आप कुछ बोल ही नहीं रही हैं! कहीं मैं आपके निजी मामलों में दखलअंदाजी तो नहीं कर रही?” रंजना खामोश हो गई।

“ऐसा नहीं है रंजना जी! इस स्कूल में बारह सालों से हम साथ हैं, इंसान किसी के आगे अपना दिल खोलता ही है। हमने भी अपने सारे सुख दुख बाँटे हैं। आपको अच्छे मूड में देखा तो उदासी घोलने का मन नहीं हुआ। मैंने छुट्टी का आवेदन नहीं दिया था।मेरा रक्षाबंधन में मायके जाने का प्रोग्राम नहीं है।

आपने पूछा है तो बताती हूँ। मेरे बच्चे बढ़ती उम्र के साथ अब समझदार हो गए हैं। वहाँ मेरे और दीदी के बीच किए गए भेदभाव को समझने लगे हैं। दीदी बड़े व्यवसाई की पत्नी हैं, उनके परिवार को विशिष्ट आवभगत मिलती है। मैं और मेरे पति शिक्षक हैं, पहुँचते ही रसोई में धकेल दी जाती हूँ। रसोई ही मायका बन जाता है।

शिकायत नहीं करती; यूँ तो वर्ष भर जाने कितनी बार आना-जाना लगा रहता है। दीदी से भी मुलाकातें होती हैं, पर कुछ वर्षों से रक्षाबंधन पर हम दोनों बहनें बारी-बारी जा पाती हैं।”, स्वर में दर्द प्रतिध्वनित हुआ।

रंजना विचारों में डूब गई, “क्या धनाभाव माँ-बाप के प्यार में अंतर ला सकता है? सारे नहीं, पर कुछ माँ-बाप अपवाद स्वरूप अवश्य ऐसे होते होंगे, तभी तो ऐसी कहानियाँ जन्म लेती हैं।’


नीना_सिन्हा/पटना

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