साजन नहीं आए

आया सावन माह सखी रे,

साजन नहीं आए।

रिमझिम-रिमझिम पड़े फुहार,

लागे तन-मन में अंगार।

धरती मां से उठती सोंधी-खुश्बू,

मन मेरा बहकाए।

सखी रे,साजन नहीं आए।

किससे कहूं मैं पीर हिया की,

मन ही मन अकुलाऊं।

सखियां मिलि साजन संग झूलें,

मैं तकती रह जाऊं।

मुंह से तो मैं कुछ न बोलूं,

अंखियां सब कह जाए।

सखी रे,साजन नहीं आए।

दादुर, मोर,पपीहा बोले,

कोयलिया राग सुनाए।

बैरन रतिया काटे नहीं कटती,

मदन भी मोहे उकसाए।

सखी रे!साजन नहीं आए।

कासे कहूं मैं पीर हिया की,

कैसे कह दूं बात जिया की।

साजन-साजन मन में रटती,

पर मुंह से कह न पाए।

सखी रे! साजन नहीं आए।


अनुपम चतुर्वेदी, सन्त कबीर नगर, उ०प्र