हादसा हो जाऊं,,,,,,

तेरी नज़रों सी नज़र

मैं कहाँ से लाऊं,

बेसबब क्यों मैं ततुझसे

ख़फ़ा हो जाऊं,

राब्ता मुझसे महफ़िल

में नहीं उसका,

बेहतर है खामोशी से

दफ़ा हो जाऊं,

मायूस जुस्तजू है दिल 

भी टूटने वाला,

सफ़ीना मेरा डूबे  ,मैं 

हादसा हो जाऊं,

अफ़साना मेरा  किसी

अफ़साने नहीँ ,

बहती रहे आँखें टूटा

आइना हो जाऊँ,

छेड़ते क्यों हैं बरसों पुराने 

मंज़र मुझको,

दीदार का यारब कोई तो 

बहाना हो जाऊँ,

शर्मिंदा न कर तर्क़तालुक़

करके "मुश्ताक़"

मेरी तो यही तमन्ना के बस

में तेरा हो जाऊँ,


डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह,,,,

सहज़ हरदा,,,,,,,,,,,,,

मध्यप्रदेश,,,,,,,,,,,,,,