ढाई आखर

प्रेम जो कन्हैया से लगाई,

ढाई आखर प्रेम कि 

महिमा समझ में आई।

जग को भूल मोहन प्यारे 

तुममें समाई,

हुई बातो कि झंकार जब 

तुमने मिलने कि तारीख बतलाई।

सहेलियां छेड़े मुझे संग तुम्हारे

 नाम से जग हंसाई,

खुश तो हुयी तुम्हारी 

बावरी जो कहलाई।

श्रृंगार कि जब बारी आई,

याद आया कि कान्हा को 

मैं सादी ही मन भाई।

हो सके तो श्याम तुम खुद आना

 या फिर पग चिन्ह छोड़ जाना 

यूँ प्रीत पराई,

तुमसे मिलने कि आशा 

मुझ में बंधाई।


ईशानी मुखर्जी

रायपुर- छत्तीसगढ़-9399745063