हमारा अस्तित्व

अस्तित्व हमारा भारत से  भारत से ही अपना मान।

भारत के रक्षा की खातिर न्यौछाबर हो अपना प्राण।।


जब बात उठे देश रक्षा की पहली पहल हो स्वयं का हाथ।

किंतु परन्तु करने वाले बगल हटेंगे आपने आप।।


गौ रक्षा की बात उठे तो राजा दिलीप सा कर्म प्रधान।

अपने जीवन का भी अर्पण जब रक्षा हो धर्म प्रधान।।


समर्पण की अगर बात करें तो दधिची का वो हड्डी दान।

बज्र पिनाक अमोघ अस्त्र बन अमर हुए फिर सकल जहाँ।।


अस्तित्व बचाना हो जब धर्म का  शंकर ने पकड़ा धर्म ध्वज को हाथ।

घूम घूम कर भारत भर में जोड़ दिया एक नया अध्याय।।


उस राणा का आत्म बल लड़ते रहे उस बहसि के साथ।

घास बिछौना घास ही खाना लड़ते रहे वो अंतिम श्वास।।


सुभाष भगत और आजाद की कहानी गत जाए नव निर्माण।

अपनी अपनी सूझबूझ से देश रक्षा का किया जो काम।।


उन वीरों  की अमर कथा को इतिहास गा रहा बारंबार।

उनके पद चिन्हों पर चलकर रचना अब एक

नया इतिहास ।।


श्री कमलेश झा

नगरपारा

भागलपुर