समय

सुमित्रा की आवाज़ से सुबह सुमित घबरा गए, नींद में 5 बजे बड़बड़ा रही थी, "अरे देखिए, अमित बिस्तर से गिर गया है, चोट तो नही आई।"

सुमित ने जोर से कहा, "क्या हुआ, सपना देख रही हो क्या, उठो सवेरा हो गया, चाय बनाओ।"

और सुमित्रा उठकर बैठ गयी, "हे भगवान, सपना हमेशा मुझे अतीत में क्यों ले जाता है।"

बाह्य रूप में हम कितना भी दिखावा करे, पर अंतर्मन में बीती घटनाएं घर कर लेती है यही सोचते हुए फिर लेट गयी और विचारों में खो गयी।

दोनो सुबह 10 बजे घर और एक वर्षीय छोटे से अमित को नैनी के भरोसे छोड़कर बैंक चले जाते थे। अलग अलग बैंकों मे एक प्रतिष्ठित मैनेजर की पोस्ट को पूरी ईमानदारी से निभाते थे। बस अमित के आंसू के साथ न्याय नही कर पाते थे। घर मे उत्तम व्यवस्था प्रत्येक क्षेत्र में थी, खाने, पीने की हर चीज भरी थी, कुछ साल बाद ही सुनीता को समझ आया, नैनी तंदरुस्त होती गयी, अमित कमजोर, पतला दुबला हो गया।

एक दिन अचानक जल्दी आ गयी, घर की डुप्लीकेट चाबी रखती थी। अमित दिसंबर की ठंड में नीचे गिर गया था, नैनी छत पर धूप सेंक रही थी। 

ऐसी घटनाएं अब रिटायरमेंट के बाद सुमित्रा भूलना भी चाहे तो सपने में आकर द्वार खटखटाती हैं।

आज अमित अमेरिका में है, उसे देखने को सुमित्रा तरस रही है।

सुमित चाय का इंतेज़ार कर रहे थे, सब भूलकर उठने लगी।

सुमित ने कंधा थपथपा कर कहा, "जानेमन, याद करो हम पहले बैंक एकाउंट हम भरते रहे, हमारे पास उसके लिए समय नही था.......

आज बेटा बैंक एकाउंट भर रहा, उसके पास हमारे लिए वक़्त नही!!!


स्वरचित

भगवती सक्सेना गौड़

बैंगलोर