कवि और पाठक

कवि और पाठक का रिश्ता 

जैसे दीपक और बाती,

शब्द समिधा की लौ है कवि

तो पाठक तेल और वर्ती।

कवि की होती अपनी दुनियां,

रहते वो उसमें आशक्त,

पाठक की सराहना या आलोचना

करती लेखनी को परिपक्व।

कवि नित नव सृजन से

राह दिखता है हमें,

पाठक पथिक बन चलते हैं,

देते राह को  छाँव घने।

प्रत्येक सृजन पर कवि

राह देखता पाठक की,

कवि की लेखनी को कभी प्यार

कभी देता अनुशासन वही।

अथाह अम्बुधि में लगाकर गोते,

कवि लाता है शब्दों के रक्तमणि,

मनकों की माला में उन्हें पिरोकर,

स्निग्ध करता है अवनि।

पाठक जब करते माला को धारण

तब बनती है कविता,

सार्थक होता है तब सृजन,

जब बहती प्रेम सौहार्द की सरिता।

सत्य है यह,बिन पाठक 

एक कवि अधूरा है,

अंतहीन व्योम बिन 

सुधाकर कब पूरा है?

साहित्यकार का नाम

रहता हर रचना अंत में,

पारखी पाठक ही ले जाता 

उसे आदि से अनन्त में।


           रीमा सिन्हा (लखनऊ)