हर अंत के बाद भी..

अपने अस्तित्व की तलाश में

किसी और के 

"न होने" की शर्त नहीं है कविता ,

प्रखर अंतर्विरोधों के बावजूद 

प्रेम को बचाए रखने की जिद् भी है ये ,


जनाक्रोश के इस युग में

भावनाओं का बैनर संभाले

अकेले ही ढेरों क्रांतियों को जीता है इसने

सिर्फ और सिर्फ

प्रेम के विश्वास पर !!


वैसे भी

सिर्फ लौटने की ही तर्ज पर अब लौटी है ये ,

वो जो "छूट" जाता था हर बार

पीछे कहीं राह में ,

उसको भी समेटे रखा है इसने

अपने अंतस में

हर अंत के बाद भी !!


नमिता गुप्ता "मनसी"

उत्तर प्रदेश , मेरठ