नहीं उठा मेहंदी जुलूस लोगों में बे चैनी :मोहम्मद सैफ साबरी

(संवाददाता मोहम्मद सैफ)

पहली मोहर्रम से लेकर नौ मोहर्रम तक दुनिया भर में अधिकांश मुस्लिम समाज गम (शोक) मनाता है। यह मुहर्रम का महीना नवासए रसूल इमाम हुसैन (अ) की शाहादत से मंसूब है। राजधानी लखनऊ का मुहर्रम दुनिया भर में एक अलग पहचान रखता है। इसको मर्कज़े अज़ादारी भी कहा जाता है। लोगों का मानना है, कि लखनऊ का मुहर्रम जैसा दुनिया में कहीं नहीं होता विशेष तौर से पुराने लखनऊ का मुहर्रम अपने आप में अपनी मिसाल आप है। मगर आज हुसैनाबाद से लेकर बज़ाज़ा काज़मेन नूरबाड़ी बुनियादबाग जैसे इलाक़े पूरी तरह गम में डूब जाते है। और चारों तरफ काले झंडे लहराते नज़र आते हैं। मगर इस वर्ष भी कोरोना की आड़ में वेशेष एक समुदाय के साथ जियादती के चलते लखनऊ ही नहीं देश में मुहर्रम सिर्फ नाम मात्र मनाया जा रहा है। जहाँ एक तरफ धार्मिक स्थलों इमामबार्गाहों  और मस्जिदों में एकत्रित होने पर रोक है। वहीं बाज़ारों और बसों में बम पर भीड़ और खुल कर लोग सभी आवश्यक काम कर रहे है। उत्तर प्रदेश में शनिवार एवं रविवार का लॉकडाउन लगा था। जो हटाकर अब सिर्फ रविवार का बचा है। इसके चलते भी लोगों में रोष है। रोष और अफ्सोस के साथ भले ही इस साल भी मोहर्रम में लोगों ने शांति के साथ अपने घरों में ताजिया रख लिये हो मगर कहीं ना कहीं लोगों में इसका दर्द तो है ही। आज सात मोहर्रम को आसिफी  इमामबाड़े से इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भतीजे हज़रत क़ासिम की मेहंदी का जुलूस निकाला जाता था। जो कर्बला की याद दिलाता है। और लोग लोग 7 तारीख को हज़रत क़ासिम को पुरसा देकर शोक मनाते हैं एवं कर्बला के शहीदों की याद में डूब जाते हैं। बिलक बिलक कर सिसक सिसक कर रोते हैं। हजरत कासिम की मेहंदी का जुलूस 7 तारीख से मंसूब है। आपकी शादी 9 मोहर्रम को हुई थी 10 मोहर्रम को कर्बला में यजीद की फौज द्वारा आपको बर्बरता पूर्वक शहीद कर दिया गया था। और उनकी लाश पर घोड़े दौड़ा कर लाश को पामाल यानी रौंद डाला था उन ही की याद में शिया समुदाय ही नही बडी संख्या में सुन्नी समुदाय भी आसिफी इमामबाड़े से सात मोहर्रम को मेहंदी के जुलूस में शामिल होते हैं। यह जुलूस बड़े इमाम बड़े से उठ कर छोटे इमामबाड़े पर जाकर समाप्त हो जाता है। इसमें भारी तादाद में लोग एकत्रित होते हैं। लेकिन इस वर्ष भी कोरोना की आड़ लेकर मुस्लिमों को टार्गेट कर बहुसंख्यक समुदाय को मेसेज देने की कोशिश है। इसी के चलते रोडो पर सन्नाटा नज़र आरहा है। लोग अपने घरों में ही मेहंदी रखकर हज़रत कासिम को याद कर पुरसा देकर मजलिस बरपा कर रहे हैं।