॥ उपहार ॥

जीवन को दिया है तुँने उपहार

मन क्यूँ रोता है बार वार

ये कैसा दिन दिखलाया है

जग पराया ही नजर आया है


जीवन को दिया है तुँने उपहार

दिल फिर रोता है बार बार

ये जुल्म सितम की नगरी है

जीवन दुःख भरी छतरी है


जीवन को दिया है तुँने उपहार

ये कैसा है तेरा परोपकार

जब ख़ुद का साया बेगाना है

फिर जग में क्यूँकर आना है


जीवन को दिया है तुँने उपहार

दुःख  से भरी पड़ी है ये संसार

जीवन दुःख की गहरी सागर है

नहीं मिलता सुख का गागर है


जीवन को दिया है तुँने उपहार

वापस ले ले हमरी संसार

जीवन काँटों का है सेज बना

दौलत ही अपनों का बैर बना


जीवन को दिया है तुँने उपहार

जग में भरा पड़ा है अत्याचार

हर कोई बना अनजाना है

अपना में भी नहीं कोई ठिकाना है I


उदय किशोर साह

मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

9546115088