यहाँ सब कुछ बिकता है

शहर में ‘बेचैयों’ की एक नई टोली आयी है। एक ही धुन बार-बार लगाए जा रहे हैं। धुन में बार-बार ‘निजीकरण-निजीकरण यही हमारा समीकरण’ की पिपुड़ी बजाए जा रहे हैं। ये बेचैये इतने शातिर हैं कि अपने नाखूनों से जड़ सहित महावृक्ष उखाड़ने की काबिलियत रखते हैं। पत्ता, तना, शाखा, फल, फूल, जड़ सब कुछ बेचे जा रहे हैं। बेचने का ऐसा जुनून छाया है कि अपना जमीर तो पैदा होते ही बेचकर गंगा नहा चुके हैं। जो दिखे उसे बेच दो। जो झुके उसे तोड़ दो। जो मुडे उसे मरोड़ दो। बेचने, तोड़ने और मरोड़ने का एजेंडा लेकर जहाँ-तहाँ बेसुरों रागों की झड़ी लगाए जा रहे हैं। बेसुरों रागों से पीड़ित कान लहूलुहान हो चुके हैं। बेसुरे रागों के चलते देशभक्ति बोझभक्ति बनती जा रही है। सरकारी संस्थाओं के सुरों में अब पहले जैसा दम नहीं रहा। इसलिए इन्हें निजी सुरों को सौंपा जा रहा है। निजी सुरों को सौंपने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे घाटे में चले जाएँ तो उन्हें बैंकों से ऋणमुक्त किए जाने की सुविधा उपलब्ध होती है।

भागते भूत की लंगोटी भली की तर्ज पर सरकारी संस्थाओं को औने-पौने दाम पर बेचे जा रहे हैं। बहुत जल्द ‘एक पर एक फ्री’ का चलन आरंभ होने वाला है। जरूरत पड़ी तो ‘एक पर दो फ्री’ का ऑफर भी दिया जा सकता है। जेब से अपना क्या जाने वाला है। सास-ससुर की कमाई दामाद चुटकियों में चट कर जाता है। एक जरूरी सूचना बहुत जल्द जारी की जाने वाली है। नदियों को बताए बिना पानी, तटों को बताए बिना लहरों, पुतलियों को बताए बिना सपनों को बेचने की खबरें बड़ी तेजी से वाइरल होने वाली हैं। जरूरत है तो खरीददार की। खरीददार मिल जाए तो पूरे देश को बेच सकते हैं। सड़क किनारे रेहड़ी लगाए औने-पौने दाम पर गाजर-मूली की तरह सब कुछ बेचे जा रहे हैं।

आजकल आसमान डरा-डरा और सहमा हुआ है। किसी ने उसे बताया कि इन बेचैयों की बुरी नजर अब उसी पर है। मौका मिलते ही तराजू थामे किलो के हिसाब से आसमान तोल-तोलकर फल-फूल की तरह बेच देंगे। कौन कहता है कि देश खून-पसीने से खड़ा होता है। खून-पसीने में मिठास नहीं होती। उसमें नमक था, नमक है और नमक रहेगा। असली मिठास तो बेचने में है। बेचो और मौज करो। बेचैये मुँह में राम हैं, लेकिन बगल में छुरी धरे सरकारी संस्थाओं की डोर काटे जा रहे हैं। वे आत्मनिर्भर बनाने के चक्कर में पूंजीवादियों को फर्श से अर्श पर पहुँचाते जा रहे हैं। बेचैये देश को पूंजीवादी गिद्धों के हाथों में धरकर ‘चुटकियों में देश कैसे बैचें’ की नई इबारत लिख रहे हैं।

 डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा उरतृप्त, मो. नं. 73 8657 8657