हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा

खचाखच भरी अदालत में जज फैसला सुनाने के लिए तैयार हुए। सभी उनकी ओर  आश्चर्य भरी निगाहों से देख रहे थे, इसलिए नहीं कि वे फैसला सुनाने जा रहे हैं। इसलिए कि दस साल लंबे चले केस का जो अंत होने वाला था। वह क्या है न कि देश में अन्याय चप्पे-चप्पे पर मिल जाता है और न्याय सदी में एक बार। यहाँ चार सेकंड में एक बच्चा जन्म लेता है और पाँचवें सेकंड में अपराध। इस हिसाब से कोर्ट-कचहरी का कम पड़ना स्वाभाविक है। गरीब किसान का मामला था। गरीब किसान के पास तीन हुनर बड़े गजब के होते हैं। एक उधारी लेकर किसानी करना, दो हर किसी के सामने हाथ जोड़े माई-बाप करना और तीन आपदा के समय आत्महत्या करने का जिगरा पालना। शायद ही दुनिया में ऐसा कोई देश होगा जहाँ का किसान ऐसा कर सकता हो। इसीलिए यूँ ही हमारा देश महान नहीं कहलाता। वह महान कहलाता है ऐसे किसानों के चलते।

बहरहाल बात चल रही थी जज के फैसले के बारे में। किसान बड़ी आस के साथ जज के सामने हाथ जोड़े खड़ा था। जज ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए गरीब किसान के पक्ष में न्याय दिया। किसान को भी लगा कि सदियों में एक बार ऐसी अजीबोगरीब घटना जरूर घटती है। सो आज वह घटना घटी। जज ने कहा, दो बीघा जमीन तुम्हारी है। इसे गैर कानूनी ढंग से कब्जाया गया था। मैं फैसला सुनाता हूँ कि तुम्हारी जमीन तुम्हें दी जाए। गरीब किसान की खुशी का कोई ठिकाना न था। ठिकाना इसलिए नहीं था कि वह अपनी जमीन को अपनी जमीन कहलवाने के लिए न जाने कितने ठिकानों की धूल फाँकी।

अपने पक्ष में फैसला सुनकर फटी कमीज, झुकी कमर, बूढे बाल और हसरतों का पुलिंदा कहलाने वाले किसान ने कहा – माई-बाप! आज आपने यह विश्वास दिला दिया कि अभी न्याय मरा नहीं है। भगवान आपको हमारे पड़ोसी राममोहन की तरह तरक्की दे। जज ने आश्चर्य से पूछा – वैसे राममोहन क्या करता है? किसान ने कहा – वैसे वे करते तो कुछ खास नहीं हैं लेकिन बातें बड़ी पते की करते हैं। जब मैंने कचहरी में अपनी जमीन हड़पने की शिकायत दर्ज की थी, तभी राममोहन ने मुझे सलाह दे डाली थी कि कोर्ट-कचहरी के चक्कर में क्यों पड़ते हो। जितनी की जमीन नहीं है उससे ज्यादा तो केस में लग जाएगा। दरोगा साहब को पाँच-दस हजार दे दो, मामला रफा-दफा हो जाएगा। हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा।

यह सब सुन जज साहब आश्चर्चचकित रह गए। कोर्ट के भीतर सभी लोगों ने मानो ठहाके मारकर गरीब किसान की बात पर अपनी हामी भर दी थी।      

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657