मजदूर

बिखरी हुई उम्मीदें औऱ अधूरी आस लेकर

वो लौट रहे थे अपने गाँव अपनों के पास!

लम्हे दो लम्हे का झगड़ा था वक्त से

विचारों के भीषण उत्पात से,

उबार रहे थे स्वंय को लगातार 

हाँ वो मजदूर था।

कई महीनों से अपनों से दूर था,

बार बार चौंधिया रही थी 

कुछ सवालों की रोशनी

गड्ढे में धँसी आँखों को पत्नी का ख़ुश्क पड़ा

मुरझाया बेजान सा चेहरा

मुन्नी की वो फटी फ्रॉक

जिसे अपनी साड़ी के पल्लू से

सीं दिया था एक माँ ने

मां की दवाइयों का पैकेट

जो कई दिन पहले खत्म हो गया था

बापू के खाँसने की आवाज

अपनी पुरानी जमीन की उम्मीद

जो गिरवीं रख गयी थी कई साल पहले,

मानो उन पन्नों की खरखराहट

कानों के पर्दों को फाड़े डाल रही हो।

इस बार लौट रहा था वो खाली हाथ

न उम्मीदें थीऔर न कोई अपना साथ

बुदबुदा रहा था कुछ तो हौले हौले से

ये पापी पेट औऱ कमबख्त ये सख्त जान

कड़वाहट घोलता ये सत्र

और फीका सा तल्ख स्वाद,जीवन की बेजारगी,

औऱ उम्मीदों की आंच पर

जल रही सपनों की रोटी वक्त के कहर में,

छिन गई रोटी,मिट गई बोटी

फिर रह गयी अधूरी आस

अधूरी भूख अधूरी प्यास

                                

डॉ0संयोगिता शर्मा,वरिष्ठ कवयित्री 

व स्वतन्त्र लेखिका,बबराला-सम्भल, उत्तर प्रदेश