ओलंपिक्स का जुनून, घर में नहीं सुकून

लगता है ओलंपिक्स देखकर तुम्हारे अंदर का खेलैया कीड़ा बड़ा उछल-कूद कर रहा है। तुम्हें, भाला ही चाहिए न, दिला देंगे, लेकिन पहले दसवीं में अव्वल तो आकर दिखाओ। तब तक यह झाड़ू लो। इसकी एक-एक सींके लेकर दूर तक फेंकने की कोशिश करो। वैसे बातें तो तुम अच्छी फेंक लेते हो। इसलिए सींके फेंकने में तुम्हें दिक्कत नहीं आनी चाहिए। पिता ने बेटे के भीतर दौड़ रहे ओलंपिक्स जोश के खून को ठंडा करते हुए कहा।   

माँ ने बिटिया से कहा, तुम तेज धावक बन सकती हो, दौड़ती भी अच्छा हो, एक काम करो, स्पोर्ट्स के किसी कोटे से जॉब-वॉब ले लो। फिर तो पिंड छुड़ाओ इस झमेले से। कम से कम फ्यूचर तो बन जाएगा। वर्ना शादी के लिए पैसे का जुगाड़ कैसे होगा?

शर्म कर शर्म! देख तेरे साथ पढ़ने वाला मोहन अठानवे प्रतिशत से टॉप कर गया और तू सारा दिन ये उठा-पटक (कुश्ती) में टाइम बर्बाद करके पचास पर अटक गया। आज से तेरी यह उठा-पटक बंद। पढ़ाई में ध्यान दे नहीं तो हाथ-पैर तोड़कर घर पर बैठा दूँगा। भैया ने भाई को धर दबोचा।  

दीदी तुमने अपने थोपड़े की यह क्या हालत बना रखी है। इतने घूँसे खाओगी तो बॉक्सर बनो न बनो तुम्हारी शादी इस जिंदगी में होने से रही। जानती हो लोग तुम्हें औरत कम मर्द ज्यादा कहते हैं। तुम्हारे चक्कर में मेरी हालत खराब हो रही है। जब तक तुम्हारी शादी नहीं होगी तो मेरी कैसी होगी? दीदी मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ। पैर पड़ती हूँ। यह मुक्केबाजी बंद करो। उम्र की शादी हो चली है, इसलिए थोपड़े पर ध्यान दो। बहन ने दीदी से गिड़गिड़ाते हुए कहा।

लगता है नीरज, सिंधु, लवलीना, बजरंगी आदि को देख बड़े जोश में हो। बरखुरदार तुम भूल रहे हो कि उन चार-पाँचों के बारे में चार-पाँच दिन सुनोगे। बाकी दिन तो हमारे बीच ही गुजारना है। इसलिए सपने के पंख उखाड़ फेंको और हकीकत की जमीन पर जीना सीखो। घर के लोगों ने एक खेलैया जुनून  का पोस्टमार्टम करते हुए कहने लगे।

घर के लोगों की बतकही सुन हर युवा जो खेलों में अपना भविष्य संजोना चाहता है, वह एक बात कहने पर मजबूर हो उठता है। वह बात है – जब तक खरगोश को रेंगने, चील को तैरने, बत्तख को चढ़ने और हाथी को उड़ने की ट्रेनिंग दी जाएगी तब तक देश का कोई भला नहीं कर सकता। ओलंपिक्स के हीरो ने हमारे भीतर जो जुनून भरा है, उसे चार दिन की चाँदनी मत रहने दो। हौंसला नहीं दे सकते तो कम से कम पैर तो मत खींचो, क्योंकि ओलंपिक्स में मेडल जीतने से ज्यादा मुश्किल काम घर के लोगों का विश्वास जीतना है।


डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’, मो. नं. 73 8657 8657