वक़्त

बीत जाता है जो वक़्त 

वो वापिस कहाँ आता है

बंद मुट्ठी से रेत की तरह

फिसल जाता है

दे जाता है बस यादें

कुछ मीठी कुछ कड़वी

ना ही वापिस आते हैं 

कुछ लोग जो छूट जाते हैं

बस याद रह जाती हैं

उनकी बातें

उनके साथ बिताए 

वो लम्हे

वापिस कहाँ आता है

वो बचपन वो शरारतें

और वो मासूमियत

जब अपने बच्चों संग

खुद भी बन जाते थे बच्चे

बच्चे तो अब बड़े हो गए

और हम कितने अकेले हो गए

काश कुछ ऐसा हो पाता

हम जी पाते फिर से वो पल

वो लम्हें जो फिसल गए हाथ से..

बंद मुट्ठी से रेत की तरह..!!


स्वरचित एवं मौलिक

रीता मक्कड़