भागवत के मुस्लिम प्रेम पर न चौंकिए, न खुश होइए!

जो कहता है कि मुस्लिमों को इस देश में नहीं रहना चाहिए वह हिन्दू नहीं हो सकताय भारत में हिन्दू या मुस्लिम किसी भी एक का प्रभुत्व नहीं हो सकताय लिंचिंग करने वाले हिन्दू नहीं हो सकतेय हिन्दू-मुस्लिम एकता को बहकाया जा रहा है। वगैरह, वगैरह, वगैरह...! ऐसी ही कुछ वे बातें कही गई हैं, जो भारत के ज्यादातर नागरिक और नेता वर्षों से कहते आये हैं। सच तो यह है कि ये विचार समग्र भारत के सदियों से रहे हैं। देश का सुर तो हाल में बदला है। बहरहाल, अगर यह न बताया जाए कि उपरोक्त प्यारी-प्यारी, मनभावन बातें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कही है, तो शायद ही कोई विश्वास करेगा। बहरहाल, कही तो है! गाजियाबाद में संघ के एक सहयोगी संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए सर संघचालक ने यह ये विचार जाहिर किए हैं।वैसे भागवत के बयान का स्वागत किया जाना चाहिए पर यह इतने अंतर्विरोधों एवं विसंगतियों से परिपूर्ण है कि उस पर सहज भरोसा नहीं होता। अंतर्विरोध दो मायनों में हैं-पहला तो यह कि अब तक उनके संगठन की मान्यताएं एवं प्रस्थापनाएं उनके इन कथनों के विपरीत रही हैं। संघ और उनके कार्यकर्ता तो अब तक यह मानते आये हैं कि हिन्दू-मुस्लिम दो इतने पृथक समुदाय हैं जो एक साथ नहीं रह सकते। दूसरे, क्या इन पर अमल उनके स्वयंसेवक, कार्यकर्ता या सहयोगी संगठनों के सदस्य करते हैं या करेंगे? तो आखिर ये बातें उन्होंने किनके लिए कही हैं? सच तो यह है कि भारत में संघ एवं उनके सहयोगी संगठनों के अलावा कोई नहीं कहता कि भारत में मुस्लिमों को नहीं रहना चाहिए। लिंचिंग में किस विचारधारा के लोगों का हाथ रहता है, यह भी सभी जानते हैं। मोहन भागवत जिस सेक्युलरिज्म की बातें कर रहे हैं क्या उनके सदस्यों की इसमें आस्था है? नौ दशकों से भागवत का संगठन इसी विचार के साथ आगे बढ़ा है कि यह हिन्दू बहुल देश है अतरू यहां अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे का होकर रहना होगा। भारत के संविधान से उनकी शिकायत के सबसे बड़े कारण सर्व धर्म समभाव और समानता के ये ही सिद्धांत हैं। तभी तो संगठन संविधान को भी बदलना चाहता है।   

स्वामी विवेकानन्द एवं गांधीजी भी तो यही कहते आये हैं। स्वामीजी को श्युवा दिवस में समेट दिया गया है और गांधीजी की तो हत्या ही हो गई। मुस्लिमों के प्रति इसी घृणा के चलते नेहरू के पूर्वजों को मुसलमान बतलाया जाता है और धर्म निरपेक्षता को हिन्दुओं की कमजोरी। इसी साम्प्रदायिकता ने न केवल महात्मा गांधी एवं जवाहरलाल नेहरू के कामों को जटिल किया वरन हमारी आजादी की लड़ाई में विलम्ब भी कराया। आपसी घृणा ने ही देश का विभाजन भी किया। पिछले कुछ वर्षों में तो इस साम्प्रदायिकता को मानों अतिरिक्त ताकत मिल गई है। वर्तमान सरकार को उनके समर्थकों द्वारा कुछ इस कदर पेश किया जा रहा है मानो यह एक सम्प्रदाय विशेष की सरकार हो। गाजियाबाद के भाषण में सरसंघचालक तो कहते हैं कि, इस देश में लोकतंत्र है और किसी भी एक (हिन्दू या मुस्लिम) के प्रभुत्व की बात नहीं की जा सकती। दूसरी ओर, अगर सोशल मीडिया के किसी भी राजनैतिक-सामाजिक विमर्श पर जाएं तो देश के मुस्लिमों को देशद्रोही साबित करने का अभियान सा दिखलाई पड़ेगा। आईटी सेल द्वारा निर्मित सामग्री मुस्लिमों, साम्प्रदायिक सौहार्द्रता के पक्षधरों को अपमानित करने एवं गालियों से नवाजने वाली होती है। यह बड़ी विसंगति है कि आखिर जिस संगठन के प्रमुख अल्पसंख्यकों के साथ सामंजस्य बनाने की अपील करते हैं उसके सदस्यगण क्योंकर इसका ठीक उलट व्यवहार करते हैं? या तो यह माना जाए कि कार्यकर्ता अपने सुप्रीमो के कहे में नहीं हैं अथवा संघ के नेतृत्व व काडर के बीच किसी दुरभिसंधि के तहत यह बयान आया है। पिछले वर्षों में बीफ, गाय अथवा हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्ध-प्रेम-शादियों को लेकर निर्दोषों को मारने-पीटने या हत्या की घटनाएं हुई हैं। संघ प्रमुख के अनुसार ऐसा करने वाले हिन्दू नहीं हैं। अगर ऐसा है तो फिर उनकी विचारधारा पर बनी सरकारों द्वारा उन्हें संरक्षण और प्रोत्साहन कैसे दिया जा रहा है? यह कोई नहीं भूल सकता कि इन घटनाओं के कारण सारी दुनिया में भारत की छवि खराब हुई है। अगर ये विचार भागवत के मन से निकले हैं तो आखिर वे उस समय क्यों चुप रहे जब देश भर में कोरोना फैलाने का आरोप मुस्लिमों पर लगाया गया? इस प्रेम के बावजूद (अगर वह यथार्थ है तो) उनकी चुप्पी नागरिक कानूनों के बनने से लेकर उन्हें लागू करने और उनका विरोध करने वाले लोगों को कुचलने या देश भर में मुस्लिमों के साथ ज्यादतियां होती हैं तो उनकी सरकारें उन्हें न्याय क्यों नहीं देतीं? भागवत अगर हिन्दू-मुसलिम सौहार्द्रता के सच्चे हिमायती हैं तो उन्हें ऐसे तमाम लोगों को अपने संगठन से निकाल बाहर करना चाहिए जो सौहार्द्र को खत्म करने पर आमादा हैं या उनके कृत्यों के टारगेट मुसलमान होते हैं। आखिरकार मोहन भागवत तो इस सरकार के रिमोट कंट्रोल हैं।अगर वे चाहते हैं कि लोग उनकी बातों पर भरोसा करें, तो वे तत्काल आईटी सेल को बन्द कराएं एवं उन टीवी चैनलों पर अंकुश लगवाएं जो मुसलिमों के प्रति नफरत का एजेंडा सात वर्षों से चलाए हुए हैं। देश भर की अनेक जेलों में केवल मुस्लिम होने के कारण झूठे आरोपों में बन्द निरपराधों एवं उनकी मदद करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ताओं आदि को छुड़वाएं। क्या भागवत नहीं जानते कि कश्मीर से धारा 370 की समाप्ति मुस्लिमों के प्रति नफरत के चलते हुई है। इसे बहाल कराएं! निश्चित रूप से ऐसा वे कुछ भी करने से रहे। अगर ऐसे में उनके मुस्लिम-प्रेम को दिखावा कहा जा रहा है, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। जैसा कि अक्सर होता आया है, संघ प्रमुख के बयान को लेकर भी सोशल मीडिया पर उनकी पार्टी एवं अनुषांगिक संगठनों के सदस्य उलझे हुए हैं। उनके बयान से व्यथित व उद्विग्न समर्थकों को उनके संगठन के ही कुछ सहयोगी दिलासा दे रहे हैं कि यह बयान आगामी साल की शुरुआत में उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों के मद्देनजर दिया गया है। हालांकि खुद मोहन भागवत कहते हैं कि संघ का राजनीति से कुछ लेना-देना नहीं है और ये बातें संघ की छवि सुधारने के लिए नहीं की जा रही हैं। हालांकि सच्चाई तो यही है कि उप्र में नागरिक भाजपा से नाराज हैं और संघ हर हालत में योगी आदित्यनाथ को जिताना चाहता है क्योंकि योगी संघ के भावी प्रधानमंत्री हो सकते हैं। एक तरफ भागवत इस आशय का बयान दे रहे हैं पर संगठन के निचले स्तर अर्थात कार्यकर्ताओं द्वारा नफरत फैलाने का काम बदस्तूर जारी हैय और लगता नहीं कि इसमें कोई कमी आयेगी। इसलिए संघ प्रमुख के बयान पर न चौकने की जरूरत है, और न ही खुश होने की। ऐसा इसलिए कि इस संगठन की विचारधारा में नस्लीय श्रेष्ठता अविभाज्य तथ्य है और साम्प्रदायिकता उसका पोषक तत्व। जब एक सदी की इस यात्रा में कुछ सम्प्रदायों-समूहों के खिलाफ पर्याप्त जहर उगला गया हो, तो उनके लिए किसी के कहने मात्र से एकाएक प्रेम पैदा नहीं किया जा सकेगा- चाहे कहने वाला कितना भी श्रद्धेय हो। वैसे अगर समर्थक सच्चे अर्थों में भागवत के बयानों को आत्मसात कर सकें व जीवन में उतार सकें तो देश में भाईचारे का नवयुग प्रारम्भ होगा, बावजूद इसके कि पूंजीवाद, जातीय व साम्प्रदायिक श्रेष्ठी भाव, छद्म राष्ट्रवाद उन्हें ऐसा सोचने से रोकते रहेंगे। संघ प्रमुख के बयान को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिये।