ख्वाहिश

नहि चाहिए मुझे सुख इस दुनिया के,

चौखट एक  मुझे  बस तेरी  चाहिए।

जमाने ने प्यार दिया न दिया,

तेरी नजर का करम चाहिए।

याद नही है मुझे मेरे ही परम,

तू मेरा परम बना रहे यही चाहिए।

किए मैने सब के इतने जतन,

पर तेरी मनभावन सेवा सा नहीं है कोई मन।

दिलो जान से पूजा है तुझे,

मुझे सनम तुझ जैसा  ही चाहिए।

दिन रात की है एक यही प्रार्थना,

मेरी सभी भूलो के लिए है क्षमा याचना।

लब्जो से कभी हुए न बयान,

तेरे बखानों के लिए दिल साफ चाहिए।

रहोगे हमेशा दिल में मेरे,

चाहे बखानों के लिए लब्ज़ कम ही रहे।

दर तेरे से है इतनी महोब्बत हमे,

कह दूंगी अब जन्नत नहीं चाहिए।


जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद