सावन आवन दे

कभी पुरुवा कभी पछिवां ,

कभी चउवाई चल रही‌ है।

आसमान में बादल छाए,

प्राकृतिक फिज़ा बदल रही‌‌ है।

धूप अपना रूप बदलकर,

उमस भरी गर्मी लाई। छिटपुट कहीं पर बरसा  पानी,

मौसम ने भी ली अंगड़ाई।।

चहके‌ बुलबुल फूल खिले,

रौनक लौटी बन बागों में।

मास आषाढ़ गगन घन गर्जे,

 करुणा विरहन के रागों में।।

परदेश गए ‌पिय को खत में धनि,

लिख दिल का हाल बताय रही है।

सावन आय रहल सजना,

परदेशी पिया को बुलाय रही है।।

लखकर अन्तर्मन् का स्पंदन,

 कहता है पिया, प्रिया मन- भावन दे।

थोड़ा सा सब्र करो धनियां,

अभी दूर है सावन,

आवन दे।


गौरीशंकर पाण्डेय सरस