पगडंडी

चलते-चलते राहों में, 

जब रास्ते बंद दिखे, 

तब दरिया मैदान के बीच से,  

इक पगडंडी सी निकले। 


बड़े रास्ते बंद हो जाते, 

राहों में रोड़ा अटकाते, 

तो भी मंजिल तक पहुंचाने की, 

हमने देखा पतली इक पगडंडी सी। 


खेतों और खलिहान से, 

बीहड़ जंगल और पहाड़ों से, 

झाड़ी और मैदानों से, 

निकलती है हमेशा, 

इक पतली पगडंडी सी। 


कभी रास्ते बंद नहीं होते, 

चलने वाले कभी ना रुकते, 

दिखे चट्टान तो रुक नहीं जाना, 

कहीं न कहीं निकल ही आती, 

इक पतली पगडंडी सी, 


पगडंडी करती बड़ा काम, 

मुश्किल हो जाती ना काम, 

हर मुश्किलों का हल है,

ये पतली इक पगडंडी सी। 


स्वरचित -अनामिका मिश्रा 

झारखंड, सरायकेला (जमशेदपुर)