हजूर देर करदी

ग्लोबलाइजेशन के बहुत ही फायदे है।दुनिया बहुत छोटी  हो गई है,दूरियां कम हो गई। एक देश दूसरे देश के साधन संसाधन का प्रयोग कर सकते है।एक जमाना था जब (इंपोर्टेड )आयाती समान बहुत महंगा मिलता था और लोगो में उसकी चाह भी होती थी।अब सब कुछ आराम से उपलब्ध है।विदेश से अपने देश में और अपने देश से विदेश में लाना लेजाना आसान हो गया है।

 नाही संसाधन बल्कि सेवाएं भी एक देश से दूसरे में उपलब्ध है।आयात–निकास के तो खूब पक्के नियम व कानून बने है किंतु सेवओ के लिए और वो भी सामाजिक मीडिया की कंपनियों के लिए कानून सही नहीं बनाए शायद नई टेक्नोलॉजी होने की वजह से कानूनों को बनके कारागर तरीके से लागू नहीं कर पाए होंगे,और अब वही कंपनिया आंखे दिखाती है और हमारे कानून मानने से इंकार कर देती है और चित्र विचित्र तरीको से हमारे देश की राजनैतिक और सामाजिक गति विधियों में दखल देने के अलावा पर्सनल मामले में भी प्रश्न खड़े कर रही है।

  इन विदेशी कंपनियां विज्ञापन द्वारा हमारे देश में कमाती तो है किंतु हमारे देश के कानून मान ने से इंकार कर रही है और हमारे ही कानून को जुठलाने के लिए अदालतों में मुकदमे दायर कर रहे है।क्या ये ईस्ट इंडिया कंपनी है जो व्यापार के नाम से आई और बाद में अपने देश पर राज्य किया दो सदियों तक।अगर उनको हमारे देश में व्यापार करना ही है तो हमारे कानूनों को मानना ही पड़ेगा।ये जोहुकमी नही चलानी चाहिए।

 हमारे देश के व्यापारी विदेश में जा के वहां के कानूनों का पालन करते है ।तो क्या इन विदेशी कंपनियों को नियंत्रण में लाने के लिए हमने देर करदी क्या? इन कानूनों के बारे में जब कंपनिया हमारे देश में आए तभी करार हो जाना चाहिए था।अब जब कंपनिया अपनी जड़े जमा ली है,अपने पांव पसार लिए तब शायद अपने कानूनों का अमल करवाना ,थोड़ा लेट हो गया लगता है।

        अब तो ये कंपनिया आम आदमी को तो छोड़ो राजनायको और अभिंत्रियो को भी परेशान कर दिया है उनके अकाउंट थोड़ी देर के लिए बंद कर अपना मसल पावर दिखा रहे है।

 बहुत ही विवादित परिस्थितियां  उपस्थिति हो चुकी है ,अब क्या निराकरण आएगा वो तो समय ही बताएगा।

जयश्री बिर्मी

अहमदाबाद