गुरु महिमा

अंधकार से जी घबड़ाया

हार चले हम विचलित पथ में

गुरु ने ऐसी जोत जलाई

तम मिट आया जो भी मन में।


सदगुरु सच्ची राह बताकर

सुपथ चलाते हैं हम सबको

ऋण उनका यह बना रहेगा

नहीं चुका सकते हम जिनको।


गुरुवाणी अमृत से बढ़कर

अगुनहि सगुणहि सब हीं माने

उसको ही गोविंद मिले हैं

जो पहले सदगुरु पहचाने।


ब्रह्मा विष्णु शिव भी कमतर

गुरुजन बढ़कर देवता जग में

अगर गुरु की बात सुनो जो

शूल नहीं चुभ सकते पग में।


भाषा वाक अक्षर छंदों को

घोल पिलाया है गुरुवर ने

कलम अभी जो गीत सुनाए

सुर बतलाया है गुरुवर ने।


गुरु वशिष्ठ चाणक्य के जैसे

होते थे इस भारत भू पर

महारथी सम्राट बनाए

ज्ञान भूमि उनके हीं दम पर।


लक्ष्य भेद रण कौशल उनका

अब भी जीवन में हितकर है

धार कलम की गुरुवाणी से

महिमा देवों से बढ़कर है।


मैं मूरख लोभी अज्ञानी

तुम करुणा के सागर गुरुवर

वत्स को भूल न जाना अपने

इतनी विनती करता मधुकर।


मधुकर वनमाली

मुजफ्फरपुर बिहार

स्वरचित एवं मौलिक

मो 7903958085